अज़ीम शख्सियत के मालिक थे जोतीराव गोविंदराव फुले..

अज़ीम शख्सियत के मालिक थे जोतीराव गोविंदराव फुले..

# समाज से बुराईयों को मिटाना है तो स्त्रियों को होना होगा शिक्षित- ज्योतिबा फूले

# ज्योतिबा फुले जयंती पर तहलका 24×7 विशेषांक

स्पेशल डेस्क।
राजकुमार अश्क
तहलका 24×7
                भारत देश महापुरुषों का देश रहा है यहां पर ऐसी ऐसी शख्सियतों ने जन्म लिया है जिनकी विद्वता का लोहा आज भी सारा संसार मानता है फिर चाहे वह बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर हो, रविदास हो, महात्मा गांधी हो, विवेकानंद हो या फिर ज्योतिबा फूले हों… दलित जाति में जन्म लेने के बाद भी इन्होंने समाज में पूरी दुनिया में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है। गरीबी, लाचारी, बेबसी भी इनके नाम को धुधंला नहीं कर सकी ऐसी ही अज़ीम शख्सियत के मालिक थे ज्योतिबा फूले..

जोतीराव गोविंदराव फुले (ज्योतिबा फूले) का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे के एक छोटे से गांव में हुआ था इनके पिता का नाम गोविन्द राव तथा माता का नाम चिमणादेवी था। इनका परिवार कई पीढ़ियों से फूल बेचने का काम करता था जिस कारण इन्हें फूले सरनाम मिला।ज्योतिबा फूले बचपन से ही बडे़ होनहार थे एक कहावत है “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” यह कहावत इन पर पूरी तरह से सटीक बैठती थी। इन्होंने अपनी शिक्षा मराठी में पूरी की। सन 1840 मे इनका विवाह सावित्रीबाई फूले से हो गया, उस समय महाराष्ट्र में जाति प्रथा बडे़ ही वीभत्स रूप में फैली हुई थी जाति विशेष के नाम पर लोगों पर तरह तरह के अत्याचार होते थे, स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था उन्हें समाज में वह स्थान, वह प्रतिनिधित्व नहीं मिलता था जिसकी वो हकदार थी इन सबको देखकर ज्योतिबा फूले को बहुत दुख होता था ऐसे में उन्होंने ठान लिया कि वो समाज को इन कुरीतियों से मुक्त करा कर एक नया इतिहास रचेंगे।

उनका विचार था कि अगर समाज से बुराईयों को मिटाना है तो सबसे पहले स्त्री को शिक्षित करना चाहिए यही सोचकर उन्होंने महाराष्ट्र में सर्वप्रथम महिला शिक्षा तथा अछूतों के उद्धार के लिए काम करना प्रारंभ किया, जिस कारण उन्हें समाज के एक विशेष वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ा मगर वो पीछे नहीं हटे और पुणे में उन्हें लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोलने में सफलता मिली। ज्योतिबा फूले के इस सराहनीय प्रयास से समाज को एक नयी दिशा मिली। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी को भी शिक्षित करके पहली महिला अध्यापिका होने का गौरव दिलाया। उनके द्वारा किये गये सामाजिक हितों के कार्य को देखकर उन्हें 1888 में महात्मा की उपाधि से विभूषित किया गया, तब से उन्हें “महात्मा ज्योतिबा फूले” के नाम से पुकारा जाने लागे। मगर कहा जाता है कि यह मृत्यु लोक है यहां पर जिसने भी जन्म लिया उसकी मृत्यु निश्चित है 28 नवम्बर सन 1890 को भारत माता का सपूत स्त्री शिक्षा का जनक और दलित समाज का सच्चा सेवक इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गया। मगर उनके कृतित्व ने भारत के गौरवमयी इतिहास में “महात्मा ज्योतिबा फूले” का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित कर दिया है।
Apr 10, 2021

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