आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था

आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था

माँ को समर्पित राजकुमार अश्क की नवीन कृति 

आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
जिसके एक छोर में मीठी गोलियां बंधी थी, दूसरा छोर सर पर धूप से छाया किये हुए था..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
जिसके साये में रहना किसी किले से कम न था, उस आंचल में हुए छेद भी रात को जूगनू सा लगता था..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
कभी पसीने से लथपथ चेहरे को जब पोछती थी माँ, सुकून ऐसा मिलता था जैसे जेठ की जली जमीं को मेघ मिला हो..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
जो मुझे हर गुनाह से बचाने की
काबिलियत रखता था, हर मुश्किल में बन ढाल मुझे वह बचाता था..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
उस तार तार हुए आंचल की छांव महलों से बेहतर थी, उस छांव का सुकुन हर सुख सुविधा का वैभव था..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
जब कभी ललाट पर चिंता की लकीर उभरती थी, अद्भुत आंचल की छुअन से ही मिट जाती थी..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
अब सुकून नहीं मिल सकती उस फटे, मटमैले, तार तार हुए आंचल की छांव में, माँ का आंचल हुआ मुझसे दूर, माँ ने स्थान लिया परमपिता के पांव में..
आंचल ! हाँ.. वह माँ का ही आंचल था
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