ईद-उल-फित्र पर तहलका 24×7 विशेष

ईद-उल-फित्र पर तहलका 24×7 विशेष

स्पेशल डेस्क।
राजकुमार अश्क
तहलका 24×7
                 ख़ल्क के सभी बाशिंदो को “तहलका 24×7” की ओर से ईद-उल-फित्र की ढेरों मुबारकबाद… हिन्दुस्तान ही पुरी दुनिया में एकलौता अकेला देश है जहाँ इतने सारे धर्म के लोग आपसी भाईचारे के साथ रहते हैं और अपने समस्त रीति रिवाज त्योहारों को पूरी आजादी के साथ मनाते है। जिसे मनाने की आज़ादी हमारे देश का संविधान हम सबको देता है

 जिस तरह से हिन्दुओं में होली एक ऐसा त्योहार है जिसमें एक दूसरे को मुबारकबाद देने के लिए उसके घर जाया जाता है, ईसाईयों में बड़े दिन पर उनके घर और गुरु पर्व पर सिख भाई के घर जाकर मुबारकबाद दिया जाता है उसी प्रकार मुस्लिम समुदाय में भी ईद ऐसा त्योहार है जिसकी मुबारकबाद उनके घर जाकर दी जाती है। वैसे तो यह त्योहार सिर्फ मुस्लिम समुदाय का होता है मगर अन्य धर्म को मानने वाले भी अपने मुस्लिम मित्रों के घर जाकर उन्हें मुबारकबाद देते हैं तथा उनके साथ मिल बैठे कर सेवई का आनंद लेते हैं तो आज हम मुस्लिम समुदाय से जुड़े इसी सबसे अहम और मुकद्स त्योहार ईद-उल-फित्र के कुछ अनछुए पहलूओं पर रौशनी डालने का प्रयास कर रहे हैं।
हर मुसलमान माह-ए-रमज़ान के मुबारक महीने के पश्चात इस मजहबी त्योहार को मनाते है जिसे ईद-उल-फित्र के नाम से जाना जाता है। यह यक्म शव्वाल अल मुकर्रम्म को मनाया जाता है जो कि इस्लामिक कलेण्डर के दशवें महीने शव्वाल के पहले दिन मनाया जाता है। ईद का त्यौहार आपसी प्रेम सौहार्द का प्रतीक है। ईद-उल-फित्र न सिर्फ समाज को जोड़ने का कार्य करता है बल्कि आपसी लगाव को भी मजबूत करता है इसका सबसे अहम मकसद यह है कि इसमें गरीबों लाचारों मजलूमों की मदद करने की सीख मिलती है, हर उस शख्स की मदद करनी चाहिए जो अपनी मुफलिसी के कारण इस त्योहार को नहीं मना पा रहा है उसकी मदद करने से उस परवर दीगार की नजरों में यह सबसे बडी इबादत है इसे मीठी ईद के नाम से भी जाना जाता है।

# ईद से पहले अदा करे सदका-ए-फित्र

ईद का त्यौहार इंसानी बराबरी का पैगाम देता है सब एक दूसरे की खुशी में शरीक हो सके इसके लिए जका़त या फित्र देने का बंदोबस्त किया गया है, गरीबों मिसकीनो को इतना धन दे दिया जाए की वे ईद की खुशियों से महरूम न रहे। पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब ने सदका-ए-फित्र को जकातुल फित्र भी कहा है। यह ज़कात (दान) रमजान के रोजे पूरे होने के बाद दी जाती है। जकातुल फित्र, यह सदका रोजे के लिए बे-हयाई और बेकार बातों से पाक होने के लिए गरीबों को दिया जाता है।रोजे रखने के दौरान इंसान से कुछ भूल चुक हो जाती है जिन्हें माफ़ कराने के लिए सदका दिया जाता है।
हजरत अब्दुल्ला बिन उमर रजि. बयान फरमाते है कि अल्लाह के रसूल ने रमज़ान का सदका-ए-फित्र एक साअ (1700 ग्राम के लगभग) खजूर या जौ देना हर मुसलमान पर फर्ज है, चाहे वह आजाद हो या गुलाम मर्द हो या औरत, सदका-ए-फित्र हर इंसान पर वाजिब है, वह शख्स जिस पर जकात फर्ज है उस पर फित्र वाजिब है, यह इंसान को गुनाहों की गंदगी से पाक करता है.यह फकीरों मिसकीनो (असहाय) या मोहताजो को देना बेहतर होता है, ईद का चाद देखते ही फित्र वाजिब हो जाता है.ईद की नमाज़ से पहले फित्र अदा कर देना चाहिए, अगर किसी वजह से ईद की नमाज़ के बाद भी देना पडे तो भी कोई हर्ज नहीं है मगर कोशिश यही होनी चाहिए कि नमाज़ अदा करने से पहले इसको अदा कर दे। फित्र में आप नकद राशि दे सकते हैं या जो सबसे अधिक चीज़ खाई जाती है यानि खाद्य के रूप में उपयोग की जाती है उसकों भी दे सकते हैं. गेहूं अनाज, खजूर आदि से भी सदका-ए-फित्र अदा किया जा सकता है।

# क्यों मनाते हैं ईद?

इस्लाम धर्म के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी तब इस जीत की खुशी को जाहिर करने के लिए सभी लोगों ने कुछ मीठा खाया था जिससे इस परम्परा की शुरुआत हुई। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानि 624 इस्वी में पहली बार ईद मनाई गयी थी। ईद क्यों मनाते है इसके पिछे एक कारण और बताया जाता है। पवित्र कुरान के मुताबिक रमज़ान के पवित्र महीने में रोजे रखने के बाद वह परवर दिगार अपने सभी बन्दों को इनाम तकसीम करता है जो कि ईद का दिन होता है उसी इनाम का शुक्रिया अदा करने के लिए उनके बन्दे ईद मनाते हैं। सभी मजहबी त्योहार हमे भाईचारे का संदेश देते हैं उसी प्रकार ईद भी सबकों साथ लेकर चलने का संदेश देतीं है। ईद पर हर मुसलमान एक साथ नमाज़ पढ़ते है और एक दूसरे को गले लगाते हैं, क्योंकि उस ईश्वर की नजर में उसके सभी बन्दे बराबर है। इन्सान, इन्सान में किसी तरह का कोई भेदभाव नही होता है।
ईद की शुरुआत सहर की पहली प्रार्थना जिसे सलात अल फज्र कहते हैं के साथ शुरू होती है उसके बाद पूरा परिवार कुछ मीठा खाता है। इस दिन खजूर खाने की भी परम्परा है, उसके बाद नये कपड़े पहनकर सभी लोग ईदगाह जाते हैं जहाँ पर सभी एक साथ नमाज़ अदा करते है। इस्लाम धर्म में दो ईद मनाई जाती है एक होती है मीठी ईद जिसे ईद-उल-फित्र के नाम से जाना जाता है दूसरी होती है जो कि ईद-उल-जुहा के 70 दिन बाद आती है जिसे बकरीद कहते हैं इसे कुर्बानी की ईद भी कहा जाता है। मीठी ईद को ईद-उल-फित्र तथा बकरीद को ईद-उल-जुहा के नाम से जाना जाता है।
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