कलम के पहरेदारों ने खुद अपने पुरुषार्थ से बनाई अलग पहचान- पत्रकार मुलायम सोनी

मुलायम सोनी संवाददाता खुटहन "तहलका 24x7"

कलम के पहरेदारों ने खुद अपने पुरुषार्थ से बनाई अलग पहचान- पत्रकार मुलायम सोनी

# हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर तहलका 24×7 के खुटहन संवाददाता की कलम से

स्पेशल डेस्क।
तहलका 24×7
                 हिन्दी पत्रकारिता दिवस के मद्देनजर पत्रकार मुलायम सोनी ने कहा कि आज वर्तमान के परिदृश्यों के सच पर दृष्टिगत किया जाए तो पता चलेगा कि जिस तरह से अन्य व्यवस्थाओं से आदर्शों का स्खलन हो रहा है उसी तरह प्रेस की स्वतंत्रता के आदर्श का भी स्खलन हुआ है जबकि प्रेस की स्वतंत्रता एक आदर्श सिद्धांत है। इसके साथ किसी प्रकार का खिलवाड़ होना राष्ट्रीय चरित्र व कर्तव्य बोध को धोखा देना है।

प्रेस समाज का आईना माना गया है। यह समाज की अच्छे बुरे गतिविधियों को शासन- प्रशासन में पहुंचाने में सेतु का काम करता है। प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था के चार स्तंभ होते है जिसमें संसद, कार्यपालिका, न्याय पालिका व प्रेस है। यदि इसमें से कोई एक कमजोर होता है तो प्रजातांत्रिक भवन ढह जाता है। जो आज जर्जरता की ओर सम्भवतः देखने को मिल रहा है। चतुर्थ स्तंभ के रूप में कलमकार साथियों की पहचान स्वयं के कलम की ताकत से हुई है।
जबकि संविधान में तीनों स्तंभ के अलावा चतुर्थ स्तंभ का जिक्र तक भी नही हुआ है। प्रेस का काम सिर्फ किसी भी सत्ता रूढ़ सरकारों के वंदन व अभिनंदन गीतों को गाने के लिए नही है बल्कि न्याय, अन्याय, सत्य, असत्य के सभी पहलुओं में पारदर्शिता को खोज कर और बिना लाग-लपेट के सच को समाज में लाने के लिए कलम को चलाना चाहिए वर्ना कलम की धार मर जाएगी। एक महत्वपूर्ण बातें आरोप के रुप में यह भी समाज से छन छन कर आ रही है कि मीडिया भी अब व्यवसायीकरण की ओर भाग रही है जो कुछ हद तक जायज भी हो सकता है।
वहीं प्रेस की विश्वसनीयता पर भी अब सवाल उठने लगना जो अब सजगता का संदेश दे रहा है। कारण है कि एक मछली से पूरा तालाब गंदा हो जाती है।इस दाग के दलदल से बचना चाहिए। यह भी सच है कि जब जब प्रेस किसी राजनेता के लिए समस्या बना तब तब अनेक तरीकों से प्रेस को जायज- नाजायज हमलों का सामना करना पड़ा। किन्तु इससे किंचित मात्र घबराने की जरूरत नहीं है। सिर्फ राजनेताओं के चाटुकारिता, भोजभात व प्रलोभनोंं से दूर रहने की जरूरत है। तो कितना भी वह पहुंच वाला नेता हो अथवा बड़े ओहदे का अधिकारी हो वह कुछ भी मीडिया साथी का बिगाड़ नही सकता है।
आज जब कार्यपालिका में सर्वत्र भ्रस्टाचार, अनियमितताओं, अकुशलता, अनाचार और निरंकुशता का बोलबाला है।जब जनमानस में उसके प्रति विश्वास उठ रहा है। जब प्रशासन राजनीतिक कार्यपालिका के नियंत्रण और निर्देशन में न रह कर मनमानी कर रहा है और जब विधायिका भी जनसामान्य को कार्यपालिका के दुष्कृत्यों और दुराचार से राहत नहीं दिला पा रही है।
तो ऐसी वीभत्स व चित्कार के माहौल में राहत दिलाने के नाम पर प्रेस व न्यापालिका समाज के लिए आशा के दो दिए बचे रह गए है। इन्हीं पर समाज का पूरा भरोसा व उम्मीद टिका है। न्याय से वंचित समाज विवशता व वेदनाओं की आंसुओं से सराबोर होकर चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है कि मीडिया साथी समाज के बेजुबानों की आवाज व सम्वाहक बनेंं और समाज हित में अच्छे किरदार की भूमिका निर्वहन करें।ताकि कलम के सिपाहियों के दामन पर दाग न लग सके।    
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