नहीं रहे ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार, पूरा बॉलीवुड डूबा शोक में

नहीं रहे ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार, पूरा बॉलीवुड डूबा शोक में

# प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री सहित तमाम फिल्मी हस्तियों ने जताया गहरा दुःख

# जूहू कब्रिस्तान में शाम को होंगे सुपुर्द-ए-खाक

लखनऊ/मुबंई।
विजय आनंद वर्मा
तहलका 24×7
     लंबे समय से बीमार चल रहे ट्रेजरी किंग दिग्गज फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार का आज सुबह निधन हो गया। 98 वर्षीय युसूफ खान उर्फ दिलीप कुमार ने आज सुबह साढ़े 7 बजे अंतिम सांस ली। दिलीप कुमार के निधन की खबर पूरा बॉलीवुड शोक में डूबा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एवं तमाम फिल्मी हस्तियों ने दिलीप साहब के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सायरा बानो से बात भी की। दिलीप कुमार आज शाम 5 बजे जुहू के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किए जाएंगे। दिलीप कुमार पिछले कुछ दिनों से बढ़ती उम्र से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे थे और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हे 30 जून को मुंबई के हिंदुजा अस्पताल की गहन चिकित्सा में रखा गया था।

# पेशावर का युसुफ खान बन गया ट्रेजेडी किंग…

11 दिसंबर, 1922 को ब्रिटिश इंडिया के पेशावर (अब पाकिस्तान में) में जन्मे में दिलीप कुमार का असली नाम मोहम्मद युसुफ खान था। युसुफ खान ने अपनी पढ़ाई नासिक में की थी, राजकपूर उनके बचपन में ही दोस्त बन गए थे। वहीं से दिलीप कुमार का सफर बॉलीवुड में शुरू हो गया था। करीब 22 साल की उम्र में ही दिलीप कुमार को पहली फिल्म मिल गई थी, 1944 में उन्होंने फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में काम किया था। दिलीप कुमार ने करीब पांच दशक के करियर में 60 के करीब फिल्में कीं। दिलीप कुमार ने अपने करियर में कई फिल्मों को ठुकरा दिया था, दिलीप कुमार का मानना था कि फिल्में कम हो लेकिन बेहतर हों।

# सायरा बानो ने निभाया अंतिम वक्त तक साथ…

दिलीप कुमार ने साल 1966 में अभिनेत्री सायरा बानो से शादी की। जब दोनों की शादी हुई तब सायरा बानो, दिलीप कुमार से 22 साल छोटी थीं। दिलीप कुमार ने आसमा साहिबा से भी शादी की थी, हालांकि ये शादी सिर्फ 1983 तक चली थी, लेकिन सायरा बानो के साथ दिलीप कुमार का साथ अंतिम सांस तक बना रहा। सायरा बानो अस्पताल से लगातार दिलीप कुमार के चाहने वालों को उनकी हेल्थ का अपडेट देती रहती थीं। फिल्म “ज्वार भाटा” से शुरुआत करने वाले दिलीप कुमार की यादगार फिल्मों में शहीद, मेला, नदिया के पार, बाबुल, फुटपाथ, देवदास, नया दौर, मुगल-ए-आजम, गंगा-जमुना, राम और श्याम एवं कर्मा रहीं। दिलीप कुमार की आखिरी फिल्म किला थी, जो 1998 में आई थी।

# आजादी की लड़ाई के समर्थन‌ में हुई थी गिरफ्तारी..

दिलीप कुमार के पिता मुंबई में फलों के बड़े कारोबारी थे, शुरुआती दिनों से ही दिलीप कुमार को अपने पारिवारिक कारोबार में शामिल होना पड़ा। तब दिलीप कुमार कारोबारी मोहम्मद सरवर खान के बेटे यूसुफ़ सरवर खान हुआ करते थे। एक दिन किसी बात पर पिता से कहा सुनी हो गई तो दिलीप कुमार पुणे चले गए, अपने पांव पर खड़े होने के लिए। अंग्रेजी जानने के चलते उन्हे पुणे के ब्रिटिश आर्मी के कैंटीन में असिस्टेंट की नौकरी मिल गई। वहीं, उन्होने अपना सैंडविच काउंटर खोला जो अंग्रेज सैनिकों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया था, लेकिन इसी कैंटीन में एक दिन एक आयोजन में भारत की आजादी की लड़ाई का समर्थन करने के चलते उन्हे गिरफ्तार होना पड़ा और उनका काम बंद हो गया।

इसके बाद यूसुफ खान फिर से बंबई (अब मुंबई) लौट आए और पिता के काम में हाथ बंटाने लगे। उन्होंने तकिए बेचने का काम भी शुरू किया जो कामयाब नहीं हुआ।‌ एक दिन चर्चगेट स्टेशन पर जब दिलीप कुमार लोकल ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे तब उन्हे वहां जान पहचान वाले साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर मसानी मिले। डॉक्टर मसानी ‘बॉम्बे टॉकीज’ की मालकिन देविका रानी से मिलने जा रहे थे। उन्होने यूसुफ खान से कहा कि चलो क्या पता, तुम्हें वहां कोई काम मिल जाए। पहले तो यूसुफ खान ने मना कर दिया लेकिन किसी मूवी स्टूडियो में पहली बार जाने के आकर्षण के चलते वह तैयार हो गए।

दिलीप कुमार को क्या मालूम था कि उनकी किस्मत बदलने वाली है। बॉम्बे टॉकीज उस दौर की सबसे कामयाब फिल्म प्रॉडक्शन हाउस थी, उसकी मालकिन देविका रानी फिल्म स्टार होने के साथ साथ अत्याधुनिक और दूरदर्शी महिला थीं। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा ‘द सबस्टैंस एंड द शैडो’ में लिखा है कि जब वे लोग उनके केबिन में पहुंचे तब उन्हें देविका रानी गरिमामयी महिला लगीं। डॉक्टर मसानी ने दिलीप कुमार का परिचय कराते हुए देविका रानी से उनके लिए काम की बात की।

# 1250 रुपए महीने की नौकरी का मिला प्रस्ताव…

देविका रानी ने दिलीप कुमार से पूछा कि क्या उन्हें उर्दू आती है ? दिलीप कुमार हां में जवाब देते उससे पहले ही डॉक्टर मसानी देविका रानी को पेशावर से मुंबई पहुंचे उनके परिवार और फलों के कारोबार के बारे में बताने लगे। इसके बाद देविका रानी ने दिलीप कुमार से पूछा कि क्या तुम एक्टर बनोगे ? इस सवाल के साथ साथ देविका रानी ने उन्हे 1250 रुपये मासिक की नौकरी ऑफर कर दी। दिलीप कुमार ने देविका रानी को ऑफर के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके पास ना तो काम करने का अनुभव है और ना ही सिनेमा की समझ। तब देविका रानी ने दिलीप कुमार से पूछा था कि तुम फलों के कारोबार के बारे में कितना जानते हो, दिलीप कुमार का जवाब था, “जी, मैं सीख रहा हूं.” देविका रानी ने दिलीप कुमार को कहा कि जब तुम फलों के कारोबार और फलों की खेती के बारे में सीख रहे हो तो फिल्म मेकिंग और अभिनय भी सीख लोगे।

साल 1943 में 1250 रूपये की रकम कितनी बड़ी होती थी, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि दिलीप कुमार को यह सालाना ऑफर लगा, उन्होंने डॉक्टर मसानी से इसे दोबारा कंफर्म करने को कहा और जब मसानी ने उन्हे देविका रानी से कंफर्म करके बताया कि यह 1250 रुपये मासिक ही है तब जाकर दिलीप कुमार को यकीन हुआ और वे इस ऑफर को स्वीकार करके बॉम्बे टॉकीज के अभिनेता बन गए।

# और युसूफ खान से ऐसे बन गए दिलीप कुमार…

दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब उन्हे दिलीप कुमार के नाम का प्रस्ताव मिला तो यह सुनकर उनकी बोलती बंद हो गई थी और वे नई पहचान के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे, फिर भी उन्होने देविका रानी को कहा कि ये नाम तो बहुत अच्छा है लेकिन क्या ऐसा करना वाकई ज़रूरी है ? देविका रानी ने मुस्कुराते हुए दिलीप कुमार से कहा कि ऐसा करना बुद्धिमानी भरा होगा। देविका रानी ने दिलीप कुमार से कहा, “काफी सोच विचार कर इस नतीजे पर पहुंची हूं कि तुम्हारा स्क्रीन नेम होना चाहिए”। दिलीप कुमार ने जिन 60 से ज्यादा फिल्मों में काम किया उसमें महज ‘मुगल-ए-आज़म’ में वे मुस्लिम क़िरदार में नज़र आए।

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