बरखा रानी ! झूम के बरसो…

बरखा रानी ! झूम के बरसो…

अध्यापक शैलेंद्र कुमार मिश्र की नवीन कविता
बरखा रानी ! झूम के बरसो…
गर्मी की घनघोर तपन के बाद,
आया फिर बारिश का मौसम है..
धूल उड़ाती आंधियां गुम हो गईं, रिमझिम बादल की फुहार आई..
टिप-टिप तड़-तड़ लगा बरसने पानी,
सूखे खेतों को मिली नयी जिन्दगानी..
लू-अंधड़ से मिल गई मुक्ति है सबको,
मौसम ठंडा हुआ है देखो कब को..
खेतों में चहल-पहल मच गयी सुब-ओ-शाम,
हल- बैलों को लेकर सब चल पड़े किसान..
धानों की बेहन भी पड़ गई खेतों में भरपूर,
खुशहाली चेहरे पर छाई ! जो थे सब मजबूर..
‘लॉकडाउन’ में लुटे पिटे, आये थे जो मजदूर,
काम मिला ! खुशहाली छाई, घर से नहीं हैं दूर..
खेतों में रौनक लौट आई, घर में खुशियां छाईं,
बरखा ने दीन दुखियों की गृहस्थी फिर बसाई..
धान रोपाई शुरू हुई गांव के देखो चहुंओर,
नन्हे मुन्ने ! बड़ों-छोटों की होने लगी कमाई..
बैठे थे जो बने निठल्ले ! सबको मिला काम,
बिना काम जग में होता नहीं कभी भी नाम..
बरखा की ऋतु ने लौटाई शहर गांव में रौनक,
मरघट सी थी पड़ी दिखती, हो जैसे रौरव नरक..
हंसी- खुशी सब गुम थी, क्या गरीब अमीर है,
देखो कैसे पलट गई, फिर वर्षा से तकदीर है..
रचयिता
शैलेंद्र कुमार मिश्र अध्यापक
सेन्ट थामस इंटर कॉलेज,
शाहगंज, जौनपुर, यूपी
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