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Sunday, December 4, 2022

बसंत पंचमी पर तहलका 24×7 विशेष

बसंत पंचमी पर तहलका 24×7 विशेष

# बसंत पंचमी का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व, क्यों पहनते है पीला वस्त्र?

# रविशंकर वर्मा एवं राजकुमार अश्क की विशेष रिपोर्ट

स्पेशल डेस्क।
तहलका 24×7
                वैसे तो भारत वर्ष को त्योहारों का ही देश कहा जाता है क्योंकि बारह माह में यहाँ 36 पर्व अलग-अलग नामों से मनाये जाते हैं और हर पर्व का अपना अलग ही महत्व है। कुछ धार्मिक भावना से जुड़े हैं तो कुछ ऋतु परिवर्तन के कारण धार्मिक एवं वैज्ञानिक दोनों से जुड़े हैं।


आज हम एक ऐसे ऋतु के बारे में जानकारी लेकर आए हैं जिसका आधार सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक भी है। उस ऋतु को समस्त ऋतुओं का राजा कहा जाता है यानि बसंत ऋतु… इस ऋतु के विषय में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि “ऋतुओं में मै बसंत ऋतु हूँ” इसी ऋतु में माघ माह की पंचमी को बसंत पंचमी होती है जिसे सरस्वती पूजा। वागेश्वरी जयंती, रतिकाम महोत्सव आदि नामों से भी जाना जाता है। तो आइये.. इसके महत्व के विषय में कुछ रोचक बातें जानते हैं।


बसंत को सभी ऋतुओं का राजा यानि की ऋतुराज ऐसे ही नहीं कहा जाता है इस ऋतु में प्रकृति भी अपने पूरे यौवनावस्था में होती है चारों तरफ एक अजीब सी सुगंध फैली रहती जिस कारण मन मदमस्त होकर झूमने लगता है और मन रूपी पक्षी भी प्रेम के गीत गुनगुनाते हुए आकाश में उड़ने लगता है। आज के ही दिन विश्व के रचयिता ब्रह्मजी ज्ञान की देवी माँ सरस्वती जी को मनुष्य मात्र में ज्ञान का संचार करने के लिए पृथ्वी पर प्रकट किया था। ऐसी मान्यता हमारे प्राचीन धर्मग्रंथो में मिलती है। इसी कारण माताएँ अपने बच्चों को आज के दिन अक्षर ज्ञान भी करातीं है।

# बसंत पंचमी का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

हमारे जीवन में प्रत्येक रंग का एक महत्वपूर्ण स्थान है जो हमारे जीवन और व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जैसे सादगी, सौम्यता और शांति का प्रतीक सफेद रंग है, तो लाल रंग सुहागन होने एंव मंगलकारी का एक एहसास कराता है, केसरिया वस्त्र त्याग का, उसी प्रकार पीला वस्त्र शुद्धता, और सात्विक प्रवृत्ति होने का प्रतीक माना जाता है। पीला वस्त्र हिन्दू धर्म में शुभ भी माना जाता है जिस कारण शादी विवाह या किसी धार्मिक अनुष्ठान को करने के लिए पीला वस्त्र धारण करना पड़ता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी पीला वस्त्र धारण करते थे जिस कारण उनका एक नाम पीताम्बरधारी भी पड़ा है।


फेंगशुई के अनुसार भी पीला रंग सात्विक और आत्मिक रंग माना गया है यह रंग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला माना जाता है। पीला रंग सादगी के साथ साथ सूर्य के प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है यह रंग ऊष्मा का अवशोषण करके शीत ऋतु में मंद पड़ी हमारे शरीर की समस्त क्रियाओं को एक नई ऊर्जा से भर देतीं है यानि पीला रंग हमारे शरीर के तारतम्यता, संतुलन, पूर्णता, और एकाग्रता प्रदान करने का काम करता है जिससे हमारे जीवन में शुद्धता और सात्विकता आती है।


एक मान्यता यह भी है कि पीला रंग डिप्रेशन को भी दूर करने में भी महत्वपूर्ण होता है, यह दिमाग की शिथिल पड़ी नसों को भी सक्रियता प्रदान करने का काम करता है जिससे दिमाग में उठने वाली तरंगें हमें खुशी का एहसास कराती है और हमारे जीवन में उत्साह व और उमंग बढ़ता है जब हम पीला वस्त्र धारण करते हैं तो सूर्य की किरणों का प्रत्यक्ष  रूप से प्रभाव हमारे दिमाग पर पड़ता है जिस कारण उसमें नवसंचार होने लगता है।

# पौराणिक कथा

सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्माजी ने जब सृष्टि की रचना पूर्ण कर ली तब भी सृष्टि उन्हें नीरस ही लग रही थी, जिसे देखकर ब्रहमा जी को बहुत दुख हुआ, चारों तरफ एक खामोशी ही खामोशी व्याप्त थी, क्योंकि जीवों में चेतना तो थी मगर वाणी नहीं थी तब ब्रहमाजी ने भगवान विष्णु से आज्ञा लेकर अपने कमंडल से जल की कुछ बूंदे अपनी हथेली में लेकर पृथ्वी पर छिड़का जिसके प्रभाव से छ: भुजाओं वाली एक देवी का अवतरण हुआ जिसकें एक हाथ में वीणा, एक हाथ में पुस्तक, एक हाथ में पुष्प, एक हाथ में माला, शेष दो हाथों में कमंडल धारण किये हुए थी इस देवी को देख कर ब्रहमाजी उनसे अनुरोध किया कि “हे देवी मेरे द्वारा रचित सम्पूर्ण सृष्टि बिना वाणी के नीरस है आप इसमें अपनी वीणा द्वारा नव जीवन का संचार करे” ब्रहमा जी के मधुर याचना पूर्ण वचन सुन कर उस देवी ने जैसे ही अपने वीणा के तारों को छेड़ा उसमें से सात मधुर स्वर गुन्जायमान होकर समस्त सृष्टि में गूंजने लगे जिससे चारों तरफ़ का वातावरण एक अद्भुत और अदृश्य उमंग से झूम उठा। वीणा से जो सात स्वर लहरिया गूंज रही थी उनसे ऋषि मुनियों में एक आन्तरिक चेतना का संचार कर दिया था उन्होंने उन सातों स्वर लहरियां को संचित कर उसे सात सुरों के रूपों में वर्णित कर दिया यह दिन बसंत पंचमी का ही दिन था जिस दिन ब्रहमाजी के द्वारा वीणावादिनी माँ सरस्वती का अवतार इस धरती पर हुआ था इसलिए इस दिन को सरस्वती पूजा के रूप में भी मनाया जाता है।
Feb 15, 2021

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