यूपी के रण में करवट बदलती मुस्लिम सियासत…

यूपी के रण में करवट बदलती मुस्लिम सियासत…

# अब सिर्फ धर्म गुरुओं के कहने पर नहीं चलता आम मुसलमान

स्पेशल डेस्क।
रवि शंकर वर्मा
तहलका 24×7
                उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव सिर पर है। चुनाव हो और… मुसलमानों की याद न आए, यह मुमकिन नहीं.. अब तक के रुझान से ऐसा लगता है कि वे राजनीति के केंद्र में फिर से आने वाले हैं। कैसे आएंगे या आ रहे हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीतिक पार्टियां उन्हें किस तरह के नागरिक के तौर पर देख रही हैं। सबसे दिलचस्प है, जिन्हें लगता है कि उनका वोट नहीं चाहिए और जो उम्मीद में हैं, दोनों के लिए मुसलमान बड़े काम की चीज हैं। जिन्हें उनका वोट नहीं चाहिए, वे मुसलमानों से जुड़े हर मामले पर सीधे या इशारे में खुलकर बोल रहे हैं। जिन्हें उनका वोट चाहिए, वे बहुत ही नपे-तुले अंदाज में ‘मुसलमान’ बोल रहे हैं।…और मुसलमान कशमकश में हैं। लगता है जैसे उनके खाने-पीने, हंसने-बोलने, उठने-बैठने, चलने, पहनने-ओढ़ने, इबादत करने, सब पर वोटों के लिए नजर है।

# क्या करेंगे मुसलमान ?

इस चुनाव में मुसलमानों के पास क्या विकल्प है? अभी यह कहना मुश्किल है। मगर पिछले रुझान अगर कुछ बता रहे हैं तो उससे साफ पता चल रहा है कि उनके वोट किस-किस को जा सकते हैं। यानी मुसलमानों का बड़ा हिस्सा सपा की तरफ जाता है, लेकिन एक हिस्सा भाजपा को भी वोट देता है। इसी तरह सीएसडीएस का चुनाव बाद सर्वेक्षण यह भी बताता है कि मुसलमानों की बड़ी तादाद किसी धर्मगुरु के कहने पर वोट नहीं देता है। यानी मुसलमान नागरिक भी वैसे ही अपनी पसंद तय करते हैं, जैसे दूसरे तय करते हैं।

# लोकतंत्र में हिस्सेदारी की अहमियत

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सबकी मजबूत हिस्सेदारी, लोकतंत्र के लहलहाते होने की पहचान है। अगर समाज के किसी समूह की वाजिब हिस्सेदारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नहीं होती है, तो वह उस समूह को बाद में नुकसान पहुंचाएगा, पहले वह लोकतंत्र को ही कमजोर करेगा। इसलिए मुसलमानों की हिस्सेदारी के बारे में उनको नहीं, बल्कि पार्टियों को सोचना है। मुसलमानों की हिस्सेदारी घटने का मतलब है, कुछ पार्टियों की हैसियत और हिस्सेदारी का बेहद कम हो जाना। खासकर, सपा, बसपा, कांग्रेस इन पार्टियों और इनके समर्थकों को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए बेहतर है। वैसे, सोचना तो भाजपा को भी है। अगर मुसलमानों का एक ठीक-ठाक वोट लगातार उसे मिल रहा है, तो उन्हें राजनीतिक हिस्सेदारी भी मिले। मगर, क्या लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का नागरिकों के साथ रिश्ता महज वोट का है?

# खास मुद्दे

मुसलमानों की जरूरतें भी वैसी ही हैं, जैसी किसी और की। जिन चीजों से उनकी पहचान जुड़ती नजर आती है, वे उन्हें खत्म होती नजर आती हैं। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन जब बार-बार उनकी पहचान को मध्यकाल में घसीट कर जोड़ दिया जाता है तो उनका अपने मौजूदा वजूद और भविष्य के लिए परेशान होना लाजिमी है। 
कोविड से पहले नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन इसी का नतीजा था। इस माहौल में उनकी हालत बाकी नागरिकों से अलग हो जाती है। सहमा नागरिक, समान नागरिक नहीं हो सकता है। इसलिए उनके लिए इस चुनाव में दाल-रोटी के अलावा बेखौफ जिंदगी भी बड़ा मुद्दा हो सकता है। सबका साथ, सबका विकास हो, इसके लिए सबसे जरूरी है, सबका भरोसा। यह काम नीचे से नहीं, ऊपर से ही हो सकता है। इसमें सभी पार्टियों को अपने-अपने हिस्से की भूमिका अदा करनी होगी। अगर ऐसा होता है, तब ही हम यूपी में सच्चे लोकतंत्र और विकास की मजबूत बुनियाद रख सकते हैं। अब देखना तो यह है कि सभी पार्टियां आजादी के अमृत वर्ष में मुसलमानों के साथ क्या सुलूक करती हैं? उन्हें वोट के लिए पक्ष और विपक्ष में इस्तेमाल करेंगी या साझीदार और हिस्सेदार बनाएंगी।

# सांप्रदायिकता के नाम पर रोटियां सेंकने वाले संविधान के खिलाफ

मुल्क में मुस्लिमों के हालात बदलने के लिए शिक्षा बेहतर से बेहतर की जाए मुसलमान इस देश का हिस्सा है। हमने देश को बाई चांस नहीं, बाई च्वॉइस चुना है यहां की मिट्टी से हमारा ताल्लुक हैै। मजहबवाद फैलाकर जो अपनी रोटियां सेंकना चाहते हैं, वे संविधान के खिलाफ  हैं। सरकार के जिम्मेदार मुस्लिम को छोड़कर अन्य धर्म के लोगों को देश की नागरिकता देने की बात करते हैं जबकि मुस्लिमों को सुबूत न देने पर घुसपैठिया करार देकर देश से बाहर निकालने की बात करते हैं, यह गलत है। देश के कानून के हिसाब से जो हिंदुस्तानी है, हिंदुस्तानी रहे। आज मुद्दा है गुरबत का, बेरोजगारी का…।  इन सब पर हुकूमत को सोचना चाहिए सियासत तो देश की तरक्की के नाम पर होनी चाहिए।

# सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई और बेरोजगारी

देश व प्रदेश की जनता के सामने फिलहाल सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई, बेरोजगारी का है। बुनियादी चीजें लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। पेट्रोल, रसोई गैस से लेकर खाने की सभी वस्तुओं के दाम लगातार आसमान छू रहे हैं। लोगों की नौकरियां जा रही हैं कारोबार चौपट हो गए हैं। आम लोगों का जीना मुश्किल होता जा रहा है। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य भी अहम मुद्दा है। कोरोना की तीसरी लहर भी आने की आशंका बढ़ रही है।  प्रदेश की जनता इन सभी मुद्दों को ध्यान में रख कर इस बार मतदान करेगी। समाज के लिए बेहतर काम करने वाले उम्मीदवारों को वोट देकर एक बेहतर सरकार बनाएं।

# ध्रुवीकरण की कोशिशें नहीं होंगी कामयाब

सियासी लोग धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जनता होशियार है। नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों के कारोबार को काफी नुकसान पहुंचाया था। कोरोना काल में बड़ी तादात में लोग बेरोजगार हुए हैं। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि सरसों का तेल 200 रुपये के ऊपर बिकेगा, पेट्रोल 100 रुपये के पार हो जाएगा। यहां तक कि रसोई गैस एक हजार रुपये तक पहुंच जाएगी। महंगाई की मार से कोई एक मजहब के मानने वाले ही परेशान नहीं हैं, बल्कि सभी हैं। इस बार मंदिर, मस्जिद, श्मशान और कब्रिस्तान के नाम पर लोग वोट नही करेंगे। जनता अभी कुछ बोल नहीं रही है। जनता की खामोशी चुनाव में वोट की चोट करेगी।

# मुख्यधारा की ओर बढ़ता मुस्लिम मन

मुसलमानों में चेतना ने करवट लेनी शुरू कर दी है। वे मुख्यधारा की ओर खिसकने लगे हैं। वैसे, आज भी उनकी प्राथमिकता पर बुनियादी सुविधाएं ही हैं। लेकिन रोटी, कपड़ा और मकान से थोड़ा अलग हटकर प्राथमिकताओं में अब बच्चों की पढ़ाई है। इसके बाद सेहत उनकी जरूरतों में आ गई है। बेटियों की पढ़ाई का प्रतिशत बढ़ा है। सख्त पर्दे में बेटियों को रखने की परंपरा ढीली पड़ी, तो स्कूली पढ़ाई के नतीजों में मेधावी मुस्लिम बेटियां टॉप फाइव में अपनी जगह बनाने लगी हैं। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि छात्रवृत्ति, टर्म लोन, बेटी की शादियों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं का लक्ष्य लगभग पूरा हो रहा है। आहिस्ता-आहिस्ता आ रहे इन बदलावों ने मुसलमानों की पुरानी मानसिकता को दरकाना शुरू कर दिया है। इसी के चलते चुनावी अपीलों में अब काजियों के फतवे असर नहीं दिखा पाते।
आज से 20 साल पहले इस बदलाव की बुनियाद पड़ी थी, जब मुसलमानों ने कांग्रेस के पक्ष में जारी दिल्ली की शाही जामा मस्जिद के शाही इमाम का फतवा नकार दिया था। उसके बाद से वोटों के लिए फतवा जारी करने की जल्दी किसी काजी की हिम्मत नहीं पड़ती। वैसे चुनावों में अब भी मौलवी वर्ग अपील जरूर करता है, लेकिन आम तौर उस पर ध्यान नहीं दिया जाता। कई मानिंद उलमा ने अब चुनावी फतवे जारी करने से खुद को अलग कर लिया है। चुनावों में सियासी दलों का उलमा के साथ मोल-तोल कम हुआ। आर्थिक रूप से पिछड़ा मुसलमान मतदाता फतवों की बाध्यता से दूर तो हो गया, लेकिन अब भी वह राहबर की तलाश में है।
मौलवी के हटने के बाद इस खालीपन का लाभ उठाने के लिए समाज के ‘दलालों’ का कॉकस हावी हो गया। यह छोटे स्तर पर इन मतदाताओं के मतों का सौदा करने लगा। पिछले दो-तीन चुनावों में इसका बोलबाला दिखा। बहरहाल, नए बदलाव ने चेतना पैदा की है, जिससे लोगों में कशमकश है। वह अपने समाज के बाहर भी रहबर की तलाश में है। यही वजह रही कि उसने सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को अपनाया और वह मुल्ला मुलायम सिंह कहलाने लगे, तो कभी मायावती की तरफ उसने हसरत भरी निगाहों से देखा। भाजपा को हराने वाले प्रत्याशी को वोट देने की सोच में भी अब हल्का सा बदलाव दिख रहा है। तालीम, सेहत और दूसरी बुनियादी सुविधाएं जो देगा, मुस्लिम वोटर उसी रहबर से अपनी उम्मीदें वाबस्ता कर सकता है।

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