रोज़ा सिर्फ मुंह और पेट का ही नहीं.. यह आंख, कान, नाक और ज़ुबान का भी होता है, रोज़ा पाकीज़गी की शर्त है..

रोज़ा सिर्फ मुंह और पेट का ही नहीं.. यह आंख, कान, नाक और ज़ुबान का भी होता है, रोज़ा पाकीज़गी की शर्त है..

# माह-ए-रमज़ान पर तहलका 24×7 विशेषांक

# रवि शंकर वर्मा एवं राजकुमार अश्क की विशेष रिपोर्ट

स्पेशल डेस्क।
तहलका 24×7
                   रोजा ईमान की कसावट है.. रोजा सदाक़त (सच्चाई) की तरावट और दुनियावी ख़्वाहिशों पर रुकावट है। दिल अल्लाह के ज़िक्र की ख़्वाहिश कर रहा है तो रोजा इस ख़्वाहिश को रवानी (गति) देता है और ईमान को नेकी की खाद और पाकीज़गी का पानी देता है। मंजिल पर पहुंचना तब आसान हो जाता है जब राह सीधी हो। मजहब-ए-इस्लाम में रोजा रहमत और राहत का रहबर (पथ-प्रदर्शक) है। रहमत से मुराद (आशय) अल्लाह की मेहरबानी से है और राहत का मतलब दिल के सुकून से है। अल्लाह की रहमत होती है तभी दिल को सुकून मिलता है। दिल के सुकून का ताल्ल़ुक चूंकि नेकी और नेक अमल (सत्कर्म) से है इसलिए जरूरी है कि आदमी नेकी के रास्ते पर चले।

रोजा बुराईयों पर लगाम लगाता है और सीधी राह चलाता है। मगफिरत (मोक्ष) की मंजिल पर पहुंचने के लिए सीधी राह रोजा है। मगफिरत का मामला है अल्लाह का.. यानी रोजा रखकर जब कोई शख़्स अपने गुस्से, लालच, जबान, जेहन और नफ्स पर (इंद्रियों पर) काबू रखता है तो वह सीधी राह पर ही चलता है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है रोजा भूख-प्यास पर तो कंट्रोल है ही, घमंड, फ़रेब, (छल-कपट), फसाद (झगड़ा), बेईमानी, बदनीयती, बदगुमानी, बदतमीजी पर भी रोक लगाता है।

रमज़ान इस्लामिक कैलेंडर का नवां महीना होता है। इस महीने को मुस्लिम समुदाय के लोग बहुत ही पाक और अल्लाह की इबादत का महीना मानते हैं। इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार रमज़ान का महीना खुद पर नियंत्रण संयम शालीनता का महीना होता है। इस महीने में रोजे रख कर दुनिया में रह रहे गरीबों, लाचारों, बेसहारों यतीमों के दु:ख दर्द को महसूस किया जाता है उनकी मदद की जाती है। माह-ए-रमज़ान में इबादत करने पर शवाब (पुण्य) 70 गुना अधिक मिलता है। रोजे रखने वाला हर मुसलमान भोर में सूरज निकलने से डेढ़ घंटे पहले अपनी नियत बांध कर सेहरी खाता है एक बार नियत बंध गयी तो फिर वह कुछ भी नहीं खा पी सकता है और पूरे दिन निराजल उपवास करता है मगरिब यानि सूरज ढ़लने के बाद वह रोजे को खजूर और पानी से खोलता है यही नियम पूरे तीस दिन चलता है।

इस्लाम धर्म में इस महीने को बहुत ही खास़ माना गया है, वैसे तो हर मुसलमान पूरे साल अल्लाह की पांचों वक्त इबादत करता है मगर इस महीने की इबादत हर मुसलमान पर फर्ज कर दिया गया है, अगर कोई पूरे साल इबादत नहीं कर पाता है तो कम से कम एक महीने वह अवश्य ही अल्लाह की इबादत करें और कुरान के आइनें में खुद को देखें कि उसमें क्या कमियाँ आ गयीं हैं? किन बुराईयों से उसका वास्ता पड़ा है? और वह उन कमियों उन बुराईयों से तौबा करें, अपने किये गए गुनाहों से अल्लाह से माफी मांगे।

हर मुसलमान को इस महीने कुरान-ए- पाक को पढ़ना जरूरी होता है अगर कोई इसे पढ़ नहीं सकता है तो उसे सुनना ही चाहिए और उसमें दी गई हिदायतों पर अमल करना चाहिए। तीस रोजे पूरे होने पर ईद का मुबारक दिन आता है और इस दिन सभी मुसलमान ईदगाह में नमाज़ पढने जातें हैं, जहाँ पर सुल्तान और फकीर दोनों एक ही जगह खड़े होकर अल्लाह की इबादत करते हैं। उस परवर दिगार की नजरों में उसके सभी बन्दे बराबर हैं नमाज़ के बाद हर मुसलमान अल्लाह के सामने अपनी पूरे महीने भर की गई इबादत को रखता है और वह यह मानता है कि उसके द्वारा जानें अनजाने में कियें गयें सारे गुनाहों को अल्लाह ने माफ़ कर उसे नयी जिंदगानी बक्शी है। इसी खुशी में वह सबसे गले मिलकर सिवईंया की मिठास के साथ ईद मनाते हैं।

 

# रोज़ा रखने का वैज्ञानिक कारण

अगर व्रत रखना उपवास रखना या रोज़ा रखने का धार्मिक कारण है तो, वहीं इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी होता है। अगर धर्म कहता है कि इस काम को करने से ईश्वर प्रसन्न होते है तो वही विज्ञान कहता है कि इससे शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है तथा हमारे शरीर से विकृति दूर होती है। रमज़ान के महीने में रोजा रखने से सेहत को भी कई प्रकार से फायदे होतें है।

1:- रमज़ान के महीने में रोजा रखने से हम कईं प्रकार की बुरी आदतों से भी अपने आपको छुटकारा दिला सकते हैं, रोजा रखने वाला व्यक्ति सुबह से लेकर शाम तक पूरा दिन कुछ भी नहीं खाता है इससे विकृति (बुरी लत) से छुटकारा मिल सकता है। UK नेशनल हेल्थ सर्विस के एक अध्ययन के अनुसार धुम्रपान, अल्कोहल, तम्बाकू आदि जैसी बुरी लत को छोड़ने के लिए रमज़ान का पाक महीना सबसे अच्छा होता है।

2:- रमज़ान का महीना शारीरिक वजन को कम करने के लिए सबसे उपयुक्त महीना होता है। टेक्सास विश्व विद्यालय के अनुसार खाली पेट रहने या कम खाने से शरीर की सूजन कम होती है रक्त संचार सही होता है और शारीरिक मोटापा कम होता है अध्ययन के अनुसार उपवास रखने से शरीर की कोशिकाओं पर दबाव पड़ता है जिससे वजन घटता है और हम कई प्रकार की बीमारियों से अपने आपको बचा सकते हैं.

3:- रोजे रखने के दौरान कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी सही रहता है जिससे हृदय से सम्बन्धित बीमारियों में सुरक्षा मिलती है

4:- रमज़ान के महीने में खजूर का विशेष महत्व होता है, इसे मगरिब के समय रोजा खोलने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। खजूर एक ऐसा फल है जिसमें पोटैशियम, मैग्नीशियम, विटामिन बी, फाइबर सब एक साथ मिलता है जो हमारे शरीर के लिए ऊर्जा प्रदान करने का काम करता है। इसी कारण इसे खाने के लिए जोर दिया जाता है कि आपके शरीर में ऊर्जा की कमी न होने पाए और आप पूरे महीने स्वस्थ रहकर रोजा रखकर खुदा की इबादत कर सकें।
Apr 14, 2021

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