सब दिन होत न एक समान..

सब दिन होत न एक समान..

# डॉ रश्मि शुक्ला की नवीन रचना

सब दिन होत न एक समान..

मैंने सीखा मौसम से जो रहता नहीं एक समान..
हमारा जीवन मौसम सा परिवर्तन सब करो सम्मान..
आज जीवन में बड़ी तपन है तो.. न घबराना प्यारे,
हिम्मत रखना डटे रहना.. मिट जाएगें गर्दिश के तारे,
जीवन के दिन धूप छाँव से आते और जाते रहते,
पथिक बन हम सब काहे ! यह सन्देश समझ न पाते,
वन उपवन जाकर जब देखा पतझड़ से सब मुरझाए,
मैंने देखा समय कुछ बाद.. बाग बगीचा सब हरियाए,
तब जाना महसूस किया, सब दिन होत न एक समान..
न डरना अब, न रूकना, तन मन से बन जाओ बलवान..
हर्षित होकर मानव सेवा कर, जग में होगा तेरा नाम..
मानव जीवन पाकर व्यर्थ न जाएं, आओ सबके काम..
जीवन में ठंडे ठंडे बादल समान, दिन जल्दी ही आएगें..
“रश्मि” सखीयन संग मिल-जुल कजरी मल्हार गाएंगे..
✍️ लेखिका
डॉ रश्मि शुक्ला (अध्यक्ष)
सामाजिक सेवा एवं शोध संस्थान
प्रयागराज
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