साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक गांजी मियां का मेला चढ़ा कोरोना की भेंट

साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक गांजी मियां का मेला चढ़ा कोरोना की भेंट

# दो वर्षों से मेला न लगने से मायूस है जायरीन, घरों में किया कनूरी

खेतासराय।
अज़ीम सिद्दीकी
तहलका 24×7
            सैय्यद सालार मसूद गांजी मियां का मेला कस्बा के उत्तरी छोर पर स्थित गुरुखेत के पास मुख्य मार्ग से लेकर दोनों तरफ हर साल लगता है। लेकिन पिछले साल भी और इस साल का लगने वाला मेला कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गया। जिससे जायरीनों में मायूसी है। सदियों से चले आ रहे इस ऐतिहासिक परम्परा को कोरोना ने तोड़ दिया। मेला में दूर-दराज से आये जायरीनों द्वारा चढ़ावा चढ़ाया जाता था। मिन्नतें करते हुए गांजी मियां की बारात में शामिल होते थे।
साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक गांजी मियां का मेला इस बार कस्बा में लगने वाला मेला आज गुरुवार को है। इसके एक दिन पूर्व क्षेत्र स्थित मनेछा में गांजी मियां का मेला लगता है। वहां पर भारी संख्या में जायरीन एकत्र होते है। जहाँ पर रात गुजारने के बाद से उसी रात भोर से ही गुरुखेत का मेला शुरू हो जाता है। जहाँ पर जायरीन पहुँचकर अपना ढेरा डालना शुरू कर देते है। जहां पर क़नूरी करके चढ़ावा चढ़ाकर प्रसाद ग्रहण करते है।
मेले के दिन दोपहर बाद से लहबर के साथ गांजी मियाँ की बारात उठती है। बारात में जायरीनों द्वारा गीत-गाते बारात पहुँचाते है। थोड़ी दूर पहुँचाने के बाद अगले वर्ष फिर आने की कामना करते हुए वापस घर लौट जाती है। लेकिन इस बार भी और पिछले वर्ष भी मेला न लगने से जायरीन मायूस है। इस प्रसिद्ध मेले में दूर-दराज से लोग मेला पहुँचाने के लिए आते है। इस मेले को लेकर जायरीनों को काफी दिनों से इंतजार रहता है। मेले से पूर्व निशान खड़ा होता है। जिसको लेकर मुजावर मेले में आते है और मेले के साथ- साथ बहराइच तक लेकर जाते है।

# मेला न लगने से दुकानदारों में छाई मायूसी

आपको बता दे की कस्बा के गुरुखेत में लगने वाला गांजी मियां के मेले में जायरीनों के भारी भीड़ एकत्र होती है। जिसमें लगभग आठ से दस कोस की दूर से जायरीनों की आमद होती है। एक दिन पहले से ठेला, ट्रैक्टर, ऑटो, बाइक विभिन्न साधनों से मेला स्थल पर जायरीन पहुँचते है। रातभर मेले में दूर-दराज से आने-जाने वाले जायरीनों से चहल-पहल बनी रहती है। विदित हो कि इस मेले में क़नूरी करने की परम्परा है। जिसमें लोग मिट्टी के बर्तन में चना की दाल में आम, बैगन, आदि डालकर बनाते है।
जिसके लिए स्थानीय कुम्हार भी पहले से तैयारी करके मिट्टी के बर्तन बनाने में जुट जाते है। लेकिन महामारी के चलते दो साल से मिट्टी के बर्तन बनाकर मेला लगने का आस देखते रह गए। महामारी के कारण मेला न लगने से उम्मीदों पर पानी फिर गया। इसके अलावा भी अन्य मिठाई, जलेबी, गुब्बारे, खिलौना, बिसाता, सर्कस, जादू, मौत का कुआँ आदि एक सप्ताह पहले से आकर तैयारी करते और दुकान लगाते थे। लेकिन पिछले साल की तरह इस बार भी दुकानदारों के दिल की अरमां आसुओं में बह गया।

# डेरा व दुकान लगाने के लिए होती है जद्दोजहद

इलाके का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध मेला होने के नाते जायरीनों भारी तादाद में एकत्र होते है। मेला लगभग आधा किलो मीटर की दूरी तक लगता है। जिसमें पैर रखने की जगह नहीं होती है। मेले में खचा-खच्च भीड़ सुबह से लेकर देर शाम तक बनी रहती है। दरअसल सुबह के वक्त दूर-दराज से आये जायरीनों से मेला गुलज़ार रहता है और जैसे- जैसे शाम ढलती है वैसे- वैसे स्थानीय लोगों से मेला में काफी भीड़ बनी रहती है। इस तरह से मेले में भीड़ की चेन टूटने का नाम नहीं लेता है। आपको बता दे धीरे-धीरे मेला लगने का जगह सिकुड़ती जा रही है।
जिससे दूर से आये जायरीनों को ढेरा डालकर क़नूरी करने के लिए जगह के काफी जद्दोजद करनी पड़ती है। इसके अलावा भी गैर जनपद से दुकानदारी करे के लिए दुकानदार आते है। मेले से एक सप्ताह पहले से दुकान लगाने की जगह बुक कर लेते है और मेला खत्म होने लगभग एक सप्ताह बाद तक जगह की बुकिंग किये रहते है। ऐसे में ढेरा डालने वाले जायरीनों और दुकानदारो को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। जिससे कितने जायरीन दो दिन पहले ही आकर अपना ढेरा डाल देते है। कुल मिलाकर इस बार भी गांजी मियां का मेला कोरोना की भेंट चढ़ गया। और दुकानों के अरमानों और उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
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