सूर्य उपासना के पर्व छठ का पौराणिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक महत्व

सूर्य उपासना के पर्व छठ का पौराणिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक महत्व

# राजकुमार अश्क की विशेष रिपोर्ट..

स्पेशल डेस्क।
राजकुमार अश्क
तहलका 24×7
                  हिन्दू धर्म से जुड़े अनेकों पर्वो, व्रतों एंव त्योहारों का अपना एक अलग ही महत्व और इतिहास रहा है। यह व्रत या त्योहार अपने अंदर अनेकों तरह के इतिहास, वैज्ञानिक आधार तथा आध्यात्मिकता छिपाए रहते हैं। अन्य पर्वो की तरह सूर्य उपासना से जुड़ा व्रत षष्ठी पूजा या छठी मईया के व्रत का भी अपना एक अलग ही इतिहास और महत्व है। यह व्रत अत्यंत ही कठिन होता है मगर बहुत ही फलदायी माना जाता है, इसे पवित्र मन से करने की बात वेदों और पुराणों मे कही गई है। इस व्रत को करने से संतान की आयु लम्बी तथा घर मे सुख शान्ति समृद्धि आती है।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को इस व्रत को करने का विधान है। इस व्रत को सबसे कठीन व्रतों में माना जाता है क्योंकि इस व्रत को करने वाले व्रती को निर्जल बिना कुछ खाए पीए 36 घंटे तक रहना पड़ता है इस व्रत को स्त्री तथा पुरूष दोनों समान रूप से रह सकते है।इस व्रत की शुरूआत शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को खाय नहाय के किया जाता है तथा इसका पारन यानि मुख्य पूजा (समापन) सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात होता है।
आइए इससे सम्बंधित पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व के इतिहास पर प्रकाश डालते है। पौराणिक कथा के अनुसार इस व्रत मे मुख्य रूप से ॠषियो द्वारा लिखी गई पुस्तक ॠगवेद मे सूर्य पूजन, ऊषा पूजन का वर्णन किया गया है। इस व्रत मे वैदिक आर्य समाज की संस्कृति तथा सभ्यता की झलक देखने को मिलती है इस पर्व को भगवान् सूर्य, ऊषा, प्रकृति, जल, वायू आदि को समर्पित किया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार का पर्व माना जाता है मगर बिहार के लोगो का अन्य देशों व प्रदेशों मे रहने के कारण अब यह पर्व न सिर्फ बिहार में बल्कि समस्त भारत के साथ साथ विश्व के अनेक देशो मे भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार प्रियव्रत नामक एक बहुत ही प्रतापी राजा हुए इनके पिता का नाम स्वायम्भुव मनु था।राजा प्रियव्रत योगराज थे उनका मन ध्यान तथा साधना मे अधिक लगता था जिस कारण वो विवाह नही करना चाहते थे, लेकिन ब्रह्मा जी की आज्ञा तथा उनके प्रयत्न से राजा ने विवाह कर लिया काफी समय व्यतीत होने पर भी राजा के कोई संतान नही हुई जिस कारण राजा और रानी बड़े उदास रहने लगे।कश्यप ॠषि के कहने पर राजा ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान कराया। यज्ञ के पश्चात आहुति के लिए बनायी गयी खीर को कश्यप ॠषि ने प्रियवद की रानी मालिनी को प्रसाद स्वरूप खाने को दिया

जिससे उन्हे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई मगर दुर्भाग्य वश वह संतान मृत पैदा हूई। इस घटना से राजा अत्यन्त द्रवित होकर अपने मृत पुत्र को लेकर श्मशान की तरफ चल दिए और स्वयं भी पुत्र वियोग मे अपने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया। पौराणिक कथा के अनुसार उसी समय ब्रह्मा जी मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुई और राजा को ऐसा न करने को कह कर स्वयं की पूजा करने के विधि को बताया। चूंकि यह दैवी सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई है इसी कारण इस व्रत को षष्ठी या छठी मईया भी कहते है। राजा ने छठी मईया के कहे अनुसार पुत्र प्राप्ति की इच्छा से इस व्रत को पुरे विधि विधान और सच्चे मन से किया जिससे उन्हे एक पुत्र रत्न की पुनः प्राप्ति हुई।
इस व्रत का सम्बन्ध महाभारत काल से भी है ऐसी मान्यता पौराणिक कथाओ मे भी देखने को मिलती है। महाभारत कथा के अनुसार कर्ण को सूर्य का पुत्र माना जाता है। इस व्रत की शुरुआत भी कर्ण के द्वारा ही की गई थी ऐसी मान्यता है। कर्ण प्रतिदिन घन्टों कमर तक पानी मे खड़े होकर अपने पिता सूर्य की उपासना किया करते थे और उनको अर्घ्य दिया करते थे। अपने पिता सूर्य की कृपा से ही कर्ण बलशाली एवं वीर योद्धा बन सके थे तब से लेकर आज तक कमर बराबर पानी मे खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परम्परा चली आ रही है। संभवतः यह ही एक ऐसा व्रत है जिसमें डूबते सूर्य की उपासना पहले तथा उगते सूर्य की उपासना बाद में की जाती है
इसी काल से जुड़ी एक अन्य घटना का उल्लेख भी प्राचीन कथाओं मे मिलता है। कहा जाता है कि जिस समय पांडव, कौरवों के छल के कारण जुएं में अपना सारा राज पाट हार कर वन वन भटकने को मजबूर हो गए थे तब द्रोपदी ने इस व्रत को सच्चे मन से तथा पूरे विधि विधान से किया था जिससे उनका छीना हुआ राजपाट वापस मिल गया था।लोक प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सूर्य देव एवं छठी मईया भाई-बहन है जिस कारण इस व्रत में इन दोनों (सूर्य एवं छठी मईया) की उपासना एक साथ की जाती है। यह व्रत अत्यंत ही फलदायी और लाभकारी है।

# छठ के पर्व पर वैज्ञानिक आधार

छठ के दिन एक विशेष प्रकार की खगोलीय घटना भी होती है, इस दिन सूर्य की किरणें सामान्य से अधिक मात्रा में पराबैंगनी किरणों का पृथ्वी पर एकत्रित हो जाती है जिससे उनके सम्भावित दुष्प्रभाव से बचाने की क्षमता इस परम्परा में है, इस व्रत में अस्त होते तथा उगते सूर्य को अर्ध्य देने से सूर्य की रोशनी सीधे हमारे कमर के ऊपर वाले भाग पर पड़ता है जिससे अनेकों प्रकार के रोगों से लड़ने की क्षमता हमारे शरीर में विकसित हो जाती है, तथा कईं प्रकार के चर्मरोग ठीक हो जाते हैं।
इस समय मौसम में भी परिवर्तन होता है जिस कारण पाचन से सम्बन्धित अनेकों विकृतियाँ होने लगती है, मगर 36 घण्टे से अधिक समय तक निराजल रहने से पाचन क्रिया भी मजबूत हो जाती है, और शरीर में जमा विजातीय पदार्थ का दोहन प्राकृतिक रूप से शरीर अपने आप कर देता है जिससे शरीर एक नई स्फूर्ति का अनुभव करता है।

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