हिन्दी को किसी पर थोपने से पहले उसे अपनाइये…

हिन्दी को किसी पर थोपने से पहले उसे अपनाइये…

# हिन्दी दिवस पर तहलका 24×7 के उप सम्पादक सौरभ स्वप्निल की कलम से…

14 सितंबर यानी हिन्दी दिवस ! ‘अस्तित्व खतरे में है’ विषयक गोष्ठियों, ‘राष्ट्रभाषा घोषित करो’ वाले भाषणों और चिन्ताजनक लेखों का दिन.. आज के दिन हिन्दी के साथ ऐसे बरता जाता है, मानों वो लुप्तप्राय हो रही हो। ज़ोर हिन्दी से ज़्यादा अंग्रेज़ी पर रहता है कि खाये जा रही हिन्दी को..
अभी सुबह एक लेख सम्पादित कर रहा था जिसमें लिखा था कि संसदीय कार्यवाही और सदस्यों के भाषणों में हिन्दी को अनिवार्य कर देना चाहिए। लेखक ने यह भी लिख दिया कि भारत में 90 फीसद से ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हैं.. क्या ? सही में ? दरअसल यह सिर्फ गलत तथ्य नहीं है, गलत धारणा भी है। हिन्दी पट्टी में अधिकांश की चाहत होती है कि उनकी हिन्दी को दुनिया सलाम करे। ये अलग बात है कि इसी हिन्दी के व्याकरण और साहित्य से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। यह झुंड चाहता है कि पुडुचेरी के उस मछुवारे पर हिन्दी थोप दी जाए जो सिवाय तमिल के सिर्फ अंग्रेज़ी ही जरूरत भर समझता है। उसका प्रतिनिधि संसद में हिन्दी क्यों बोलेगा भला ? इसी झुंड की एक ख्वाहिश सरपट अंग्रेज़ी बोलने की भी होती है क्योंकि उसे खुद को और अपने बच्चों को ‘कूल’ दिखाना है। यह गलत भी नहीं है लेकिन क्या ऐसा करने वाले हिन्दी को लेकर इतने आक्रामक और भावुक होने का नैतिक अधिकार रख सकते हैं ?
एक और मसला है, वो है हिन्दी से अनजान डर और इसीलिए उससे परहेज करने का.. आप चाहें तो अपने घर से ही सर्वे कर सकते हैं। अंग्रेज़ी माध्यम और कहीं कहीं हिन्दी माध्यम के भी बच्चों और अभिभावकों का मानना होता है कि सबसे कठिन विषय है हिन्दी और उसमें अच्छे नम्बर लाना। शायद इसलिए कि उन्हें हिन्दी विषय पर मेहनत करना समय की बर्बादी लगता है। लोगों की हिन्दी का स्तर देखना हो तो सोशल मीडिया पर चले जाइये। हिन्दी का चिन्दी स्वरूप बड़ी बेशर्मी से मुंह चिढ़ाता मिलेगा। तुर्रा यह कि इतने के बावजूद हिन्दी पढ़ने, समझने के प्रति घोर उदासीनता क्योंकि वह तो आखिर घर की मूली ठहरी।
एक और बड़ा विषय हिन्दी में कथेतर और शोध ग्रंथों की अनुपलब्धता भी है। सच है कि बड़े विद्वान अंग्रेज़ी में ही लिखते हैं, चाहे वो हिन्दी भाषी ही क्यों न हों। इसकी बड़ी वजह टर्मिनोलॉजी तो है ही, हिन्दी में ऐसी किताबों के पाठक वर्ग की बेहद न्यून संख्या भी है। ज़ाहिर है, यही वजह है कि न सिर्फ हिन्दी में ऐसी किताबें न के बराबर हैं, बल्कि अनुवाद भी स्तरीय नहीं हैं। कम से कम हिन्दी का भला चाहने वाले लेखकों को यह तो जिम्मेदारी लेनी ही होगी कि हिन्दी लिखने पढ़ने वाले वर्ग को इतिहास, विज्ञान, शोध और दर्शन से जुड़ी किताबें समझ में आने वाली हिन्दी में पढ़ने को मिलें। हाल में ऐसी किताबें लिखने की परिपाटी देखने को भी मिली है और यह शुरुआत नि:संदेह स्वागत योग्य है। साथ ही हिन्दी प्रेमियों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी कि वो हिन्दी साहित्य और कथेतर शोधग्रंथों को हाथोंहाथ लेकर ज्ञानार्जन करें।
भारत में हिन्दी लगभग 55 करोड़ लोगों के रोज़नामचे की भाषा है। इनका उठना, बैठना इसी भाषा के विभिन्न स्वरूपों के साथ होता है। नहीं होता है तो सिर्फ पढ़ना। अगर पढ़ना भी होता है तो सिर्फ अखबारी कतरनें या व्हाट्सएप पर आने वाले सही/गलत और एजेंडापरक लेख। हम नहीं जानते कि प्रत्यय और उपसर्ग क्या होते हैं ? अनुस्वार हम कक्षा 4 में पढ़ चुके होते हैं लेकिन पहचान नहीं पाते। शब्दज्ञान और व्याकरण बोध इतना सतही है कि नीयत- नियत और विशिष्ट- विशिष्ठ का अंतर ही नहीं जान पाते, लिखते शर्म क्या ही आएगी। अब कोई यह कह दे कि इसकी जिम्मेदार अंग्रेज़ी है तो उस पर क्या प्रतिक्रिया दी जाए ?
हिन्दी का मूल चरित्र तत्सम और तद्भव को साथ लेकर चलने वाला है। हिन्दी शुद्धतावाद से भी परे है लेकिन तभी तक, जब तक कि सही अर्थ सम्प्रेषित हो रहा हो। आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि देवनागरी लिपि में लिखे इस लेख में भी बड़ी संख्या उर्दू के शब्दों की है। एकाधिक बार अंग्रेज़ी के शब्द भी उपयोग में हैं और अगर हिन्दी को आगे ले जाना है तो हमें ऐसे गठजोड़ बनाने ही होंगे। वजह सिर्फ यही है कि रोज़ उपयोग में होने के कारण यह हमारी समावेशी हिन्दी का अटूट हिस्सा हैं भाषाएं इसी समावेश से समृद्ध, स्वीकार्य और लोकप्रिय होती है। अंत में, यह कहना और समझना अनिवार्य है कि हमें सिर्फ 14 सितंबर को छोड़कर बाकी 364 दिन हिन्दी से प्रेम करने की जरूरत है। हमारी भाषा संवर जाएगी, सभी तक पहुंचने भी लगेगी…
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