बंगाल में मतदाता सूची सुधार से प्रभावित लोगों को दें निष्पक्ष मौका: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के दौरान आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों का ध्यान रखें, क्योंकि इससे एक करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं।पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया सुचारु रुप से चलनी चाहिए।

इसके साथ ही, कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया कि वह ‘तार्किक विसंगतियों’ वाली सूची में शामिल लोगों के नाम पश्चिम बंगाल के ग्राम पंचायत भवनों, तालुकों के ब्लॉक कार्यालयों और वार्ड कार्यालयों में प्रदर्शित करें, मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की तीन सदस्यीय पीठ ने की। पीठ ने गौर किया कि राज्य के 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम “तार्किक विसंगतियों” की सूची में शामिल हैं।

2002 की मतदाता सूची के साथ वंश मिलान में इन विसंगतियों का मतलब है कि कई मामलों में माता-पिता के नाम मेल नहीं खा रहे हैं या फिर मतदाता और उनके माता-पिता के बीच उम्र का अंतर 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक पाया गया है।सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया विशुद्ध रुप से संवैधानिक ढांचे के तहत की जा रही है। उन्होंने कहा हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह काम सुचारु रुप से चले और समय पर पूरा हो। साथ ही, एक पारदर्शी व्यवस्था के जरिए उन सभी लोगों को निष्पक्ष अवसर दिया जाए जिन्हें लगता है कि किसी विसंगति के कारण उन पर अनावश्यक रुप से संदेह किया जा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि मतदाताओं को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। हमने इन मामलों के दरवाजे कभी बंद नहीं किए हैं, ताकि भविष्य में कोई कठिन स्थिति या समस्या पैदा होती है, तो हम उसका समाधान कर सकें।चुनाव आयोग ने मतदाताओं की तीन श्रेणियों को नोटिस जारी किए हैं। मैप्ड, अनमैप्ड और तार्किक विसंगतियों वाले लोग। मैप्ड श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जिनके रिकॉर्ड मतदाता डेटा से जुड़े हुए हैं, लेकिन उन्हें और अधिक सत्यापन की आवश्यकता है।

‘अनमैप्ड’ श्रेणी में वे मतदाता हैं जिनके रिकॉर्ड चुनावी डेटा से जुड़े हुए नहीं पाए गए। वहीं, ‘तार्किक विसंगति’ वाली श्रेणी में वे लोग हैं जिन्हें रिकॉर्ड में गड़बड़ियों के लिए नोटिस मिले हैं। जैसे माता-पिता के नाम का मेल न खाना, स्पेलिंग में अंतर, या माता-पिता और बच्चों के बीच उम्र का ऐसा अंतर जो संभव न लगे। तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ’ब्रायन का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि लोगों को उनके और उनके दादा-दादी के बीच उम्र के अंतर को लेकर ‘तार्किक विसंगति’ श्रेणी के तहत नोटिस दिए जा रहे हैं।

इस पर बेंच ने टिप्पणी की कि दादा की उम्र 80 साल होना स्वीकार्य है, लेकिन गलती से उसे 40 साल दर्ज किया जा सकता है।बेंच ने कहा किसी के दादा की उम्र 40 साल होना संभव नहीं हो सकता। सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि एक करोड़ से अधिक लोगों की प्रोफाइलिंग इस तरह से की जा रही है।कपिल सिब्बल ने यह भी बताया कि स्पेलिंग की गलतियों के कारण लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग का कहना है कि अगर ‘गांगुली’ की स्पेलिंग में थोड़ा भी अंतर होता है, तो वे नाम हटा देते हैं।उन्होंने उदाहरण दिया कि अदालत भी जानती है कि ‘दत्ता’ (Datta) की स्पेलिंग अलग-अलग तरीके से लिखी जाती है। पीठ के सामने यह दलील दी गई कि ये नोटिस नाम हटाने के उद्देश्य से जारी किए जा रहे हैं।वकील द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि यह कहना गलत है कि स्पेलिंग की गलती होने पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं। बल्कि चुनाव आयोग का स्पष्ट निर्देश है कि केवल स्पेलिंग की त्रुटि होने पर कोई नोटिस न भेजा जाए।

उन्होंने कहा कि “तार्किक विसंगति” तब मानी जा रही है, जब कुछ मामलों में मतदाता और उसके माता-पिता की उम्र में केवल 15 साल का अंतर पाया गया, जो कि संभव नहीं है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की, यह तार्किक विसंगति कैसे हो सकती है। हम ऐसे देश में नहीं रहते जहां बाल विवाह नहीं होते। पीठ ने मौखिक रुप से यह भी टिप्पणी की कि राज्य बोर्ड द्वारा जारी कक्षा 10वीं के एडमिट कार्ड को भी गणना (सत्यापन) के लिए एक दस्तावेज के रुप में स्वीकार किया जाना चाहिए।








