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Saturday, January 10, 2026

23 साल पुराने जानलेवा हमले के केस में नया मोड़, धनंजय सिंह बनाम राज्य: सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया

23 साल पुराने जानलेवा हमले के केस में नया मोड़, धनंजय सिंह बनाम राज्य: सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया

# वाराणसी में वर्ष 2002 के एके-47 हमले से लेकर 2025 की बरी तक, अब अभियोजन की भूमिका पर उठे सवाल

जौनपुर।
एखलाक खान 
तहलका 24×7
               उत्तर प्रदेश की राजनीति और आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील और बहुचर्चित मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। वर्ष 2002 में तत्कालीन विधायक धनंजय सिंह पर वाराणसी में हुए जानलेवा हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम हस्तक्षेप करते हुए अपील स्वीकार कर ली और सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ 23 साल पुराने केस को फिर से जीवंत कर दिया है, बल्कि पीड़ित के अपील अधिकार और अभियोजन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताते चलें कि वर्ष 2002 में वाराणसी में धनंजय सिंह पर उस समय जानलेवा हमला हुआ था, जब वे सक्रिय राजनीति में थे। आरोप था कि हमलावरों ने एके-47 जैसे अत्याधुनिक स्वचालित हथियार का इस्तेमाल किया। उस दौर में यह घटना प्रदेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था और संगठित अपराध के बढ़ते प्रभाव का प्रतीक मानी गई थी। मामले में कुख्यात गैंगस्टर अभय सिंह और उसके गिरोह के नाम सामने आए थे।
जांच के दौरान वर्ष 2003 में यूपी पुलिस ने अभय सिंह के पक्ष में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। विवेचना को लेकर उस समय भी निष्पक्षता पर सवाल उठे थे। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद वर्ष 2025 में वाराणसी की गैंगस्टर कोर्ट ने इस मामले में चार आरोपियों संदीप सिंह (अभय सिंह का साला), विनोद सिंह, संजय रघुवंशी और सतेंद्र सिंह उर्फ बब्लू को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।
अदालत ने अपने निर्णय में अभियोजन की कमजोरियों को प्रमुख आधार बताया।इस फैसले के बाद विधिक रुप से राज्य सरकार/अभियोजन पक्ष को उच्च न्यायालय में अपील दायर करनी थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बाद पीड़ित धनंजय सिंह ने स्वयं उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि उन्हें बरी के आदेश के खिलाफ अपील का अधिकार नहीं है। उच्च न्यायालय के इसी आदेश को चुनौती देते हुए धनंजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है, जिससे यह मामला एक बार फिर न्यायिक विमर्श के केंद्र में आ गया है।इस पूरे प्रकरण ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं! यदि अभियोजन पक्ष अपील नहीं करता तो क्या पीड़ित न्याय के लिए पूरी तरह असहाय हो जाता है? क्या राज्य की निष्क्रियता की स्थिति में न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए? क्या गंभीर आपराधिक मामलों में तकनीकी आधार पर न्याय समाप्त हो जाना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई अब केवल इस केस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह पीड़ित के अधिकार, राज्य की जिम्मेदारी और न्याय की व्यापक अवधारणा को नई दिशा दे सकती है।23 साल पुराने इस गंभीर मामले में शीर्ष अदालत का फैसला भविष्य के कई मामलों के लिए नजीर साबित हो सकता है। फिलहाल, पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि वाराणसी के इस पुराने लेकिन गंभीर मामले में न्याय की प्रक्रिया को नई दिशा मिलेगी या नहीं।

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