हर मुसलमान के लिए क्यों जरूरी है ज़कात देना?

हर मुसलमान के लिए क्यों जरूरी है ज़कात देना?

# फैजा़न अंसारी एवं राजकुमार अश्क की विशेष रिपोर्ट

स्पेशल डेस्क।
तहलका 24×7
                     ख़ल्क के सभी मुस्लिम भाईयों को तहलका24×7 परिवार की ओर से माह-ए-रमज़ान की दिली मुबारकबाद… दान देना, पुण्य करना, मजबूरों लाचारों की मदद करना हर धर्म में लाज़मी करार दिया गया है। इसे हर मजहब में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। मगर मकसद सबका एक ही होता है वह है गरीब, असहाय और मजबूर लोगों की मदद करना.. इस्लाम धर्म में ज़कात हर मुसलमान पर खुदा ने फर्ज किया है? आज हम इसकी जानकारी लेकर आए हैं…
“ज़कात” का मतलब है कि जो आपकी पिछले साल की आमदनी हुई है उसके मूल्य में जो इजाफा हुआ है उसका 2.5% (चालीसवाँ हिस्सा) और यदि आपके पास एक तय मात्रा से ज्यादा जेवरात है अर्थात 52 तोला और 6 मासा चाँदी के मूल्य से अधिक हों तो उनके कुल दाम का 2.5% चालीसवाँ हिस्सा ज़कात निकालना होता है। यदि इससे कम जेवरात हैं तो जक़ात नहीं है। उसी तरह यदि पाँच ऊंट से कम है तो उस पर भी ज़कात नहीं है। पाँच अवाक (खाद्यान्नों को नापने का एक विशेष माप अर्थात 34 मन गल्ला) से कम आपके पास अनाज है तो उस पर भी ज़कात नहीं है।

# ज़कात पर हक किसका..

ज़कात पर पहला हक आपके सगे संबन्धियों का है जिनमें आपके क़रीबी रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त सभी हो सकतें हैं। दूसरा हक़, यतीम, मिस्कीन, फ़क़ीर (गरीब और मजबूर) ज़कात और सदक़ात की वसूली करने वाले तालीफ़े क़ल्ब, क़ैदियों को छुड़ाने वाले, क़र्ज़दारों की मदद कर उनका कर्ज़ चुकाने वाले, अल्लाह के दीन को फैलाने वाले, इसके अलावा मजबूर मुसाफ़िर को भी ज़कात दिया जा सकता है।

# ज़कात किसको नहीं देना चाहिए..

बाप, बेटी, बीबी, बेटा को ज़कात नहीं दिया जाता है। क्योंकि इनकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी खुद की होती है। इनकी देखभाल करना बेटों, पति और बाप की होती है, इस लिए ऐसे लोगों को ज़कात देने की अनुमति नहीं है।

# गरीब सगे सम्बन्धियों की गैरत का रखे ख्याल…

ज़कात पर पहला हक आपके, सगे संबंधियों का है, यहाँ एक मुश्किल यह आती है कि और तो सभी लोग ज़कात ले लेते हैं पर अक्सर आपके जो गरीब सगे संबन्धी हैं उनकी गैरत आड़े आ जाती है। क्योंकि भले ही वह आपसे गरीब हों पर रिश्ते में वह आपके बराबर ही होते हैं। अगर आपके कोई ऐसे रिश्तेदार हैं तो रमज़ान के पाक महीने के अलावा भी उनसे रूबरू जरूर हुआ करें।
उनकी मुश्किलात को समझकर उनकी मदद किया करें। जैसे अगर उनकी कोई देनदारी है तो उस कर्ज़ को चुका दें। उनकी कोई औलाद हो यदि वह तालिम हासिल करना चाहता हो तो उसकी जिम्मेदारी उठा लें। उनकी कोई बेटी हो जो निकाह लायक़ हो गई हो मगर गरीबी के कारण उसकी शादी न हो रही हो तो शादी में उनकी मदद कर दें। अगर उनके मकान का कोई काम हो जिसे वह नहीं करवा पा रहे हों और उसके लिए परेशान हों तो उसको ठीक करने में उनकी मदद कर दें। उनकी जायज़ जरुरतों को पूरी कर दें आदि इस तरह से उनकी गैरत को भी कोई ठेस नहीं पहुंचेगी और आपके ज़कात का भी सही जगह पर इस्तेमाल भी हो जाएगा। ज़कात या दान देने का एक ही मकसद होता है जरुरतमंदों की मदद करना…
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