कार्पोरेट ने मीडिया को दो धड़े में बांटा
# मीडिया का राजनीतिकरण एक दशक पूर्व 2014 में हुआ तो गोदी मीडिया ने जन्म लिया, यहीं से दो धड़ा बना।
# वर्ष 2014 में ही सोशल मीडिया जवान हुआ तो प्रिंट और इलेक्ट्रांनिक की मौत जनता की अदालत में होने लगी।
# वर्तमान लोकसभा चुनाव में मीडिया के तमाम कथित बड़े वर्कर (पत्रकार) राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता सरीखे दिखने लगे।
# दूसरी ओर विपक्षी नेताओं को सोशल मीडिया-पोर्टल आदि पर भरोसा बढ़ा, युवाओं का रुझान भी इसी तरफ टिका।
जौनपुर/नई दिल्ली
कैलाश सिंह/अशोक सिंह
सलाहकार सम्पादक
तहलका 24×7
देश का स्वतंत्रता आंदोलन रहा हो या महात्मा गांधी का नमक आंदोलन, इस दौरान पुरजी व पर्चे के जरिये आंदोलनकारियों को सूचना भेजी जाती थी। इसके बाद गांवों तक माउथ मीडिया के जरिये लोग आंदोलनों में हिस्सा लेने जाते थे। वहीं से मीडिया की नींव मजबूत हुई और उस दौर में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेम चन्द जैसे साहित्यकार अपनी कहानी के जरिये अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते थे।

कालांतर में मीडिया का असली रूप पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के समय दिखा जब इंडियन एक्स्प्रेस, जनसत्ता ने अपनी मुखरता और मीडिया धर्म का पालन किया, हालांकि उसे इसके लिए भुगतना भी पड़ा।
संचार माध्यमों के बढ़ते ही बदलती सत्ता ने मीडिया के कार्पोरेट को आगे बढ़ाते हुए परोक्ष रूप से अपने अधीन कर लिया।

वर्ष 2014 में सरकार ने कार्पोरेट मीडिया को अपने तरीके से इस्तेमाल करना शुरू किया, नतीजा आज सामने है कि 2024 के चुनाव में कथित बड़े पत्रकार पार्टी कार्यकर्ता जैसे दिखने लगे। उनके चैनलों या अखबारों में प्रायोजित कार्यक्रम दिखने लगे। पब्लिक समझती तो सब कुछ थी पर बेबसी के आगे कोई विकल्प नहीं थे।

इसी बीच सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म आते ही युवा और तमाम पुराने पत्रकार जो कार्पोरेट घरानों के दंश से व्यथित थे, सबको ऐसा फ्रीडम मिला की हर किसी के पास रीडर, दर्शक, व्युवर हजारों, लाखों और करोड़ों में होने लगे। इस लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया इतनी ताकतवर दिखी कि उसके आगे न्यूज़ पेपर और टीवी के पत्रकार हांफते नज़र आए।

आमजन ने न्यूज पेपर पढ़ना कोरोना काल में कम कर दिया। अब तो युवा पढ़ता ही नहीं। सेल फोन पर उन्हें हर सूचना मिल जाती है। टीवी पर डिबेट के नाम पर होने वाले झगड़े व प्रायोजित न्यूज देखना लोगों ने इतना कम कर दिया की उन्हें भी सोशल पर आना पड़ रहा। सोशल मीडिया के पोर्टल व यू-ट्यूबर पत्रकारों ने सत्ता के नजदीक रहने वाले मीडिया घरानों ‘गोदी मीडिया’ को पहले नम्बर पर करके खुद को असंगठित होते हुए दूसरे धड़े में स्थापित कर लिया।

यही दौर है जब विपक्षी नेताओं को इनपर इतना भरोसा हुआ कि वह टीवी इंटरव्यू में भी कहने से गुरेज नहीं करते। यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने टीवी पत्रकार से कहा कि सही बात बोलूंगा तो आपको खराब लगेगा। उनके कुरेदने पर कहा कि मुझे तो सोशल पर ही भरोसा है।अभी हाल ही में एक नेता का मन जानने के लिए दिल्ली के पत्रकार पहुंचे।

उनसे वह बार-बार यही जानने की कोशिश किए कि आपका समर्थन एनडीए की तरफ है या इंडिया की तरफ़। राजनेता ने कहा की जब मेरा दल चुनाव नहीं लड़ रहा तो अपने समर्थकों को उनके विवेक पर छोड़ दिया। हम किस प्रत्याशी का गारंटी कार्ड देंगे कि वह सांसद होने के बाद भी लोगों से फोन पर बात करेगा, उनके सुख दुख में शामिल होगा।इसी 30 मई को पत्रकारिता दिवस पर छोटे और मझोले पत्रकार बैठकें करके पत्रकारिता के मानक पर बात करेंगे और नए मानक गढ़ेंगे।

जबकि कार्पोरेट घरानों और उनके यहां नौकरी करने वाले सत्ता की मलाई तो काट रहे हैं पर इस दिवस पर केक भी नहीं काटेंगे। इस मौके पर वह रीयल से हटकर सत्ता की चाटुकारिता के लिए रील बनाएंगे, जिसे देखकर वह देश में चल रहे लोकसभा चुनाव में खुद को सफल मानेंगे, जबकि सच्चाई इसके उलट है।ऐसे रील वालों का दौर सोशल मीडिया हज़म कर चुकी है, अपने द्वारा परोसे गए रीयल से।अन्ततः यह मानिए की गोदी मीडिया के चेहरे से नकाब उतर चुका है।








