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Friday, February 6, 2026

गौ आधारित प्राकृतिक खेती से होगा कृषि का सतत विकास

गौ आधारित प्राकृतिक खेती से होगा कृषि का सतत विकास

खुटहन, जौनपुर।
मुलायम सोनी 
तहलका 24×7
               कृषि विभाग द्वारा शुक्रवार को ब्लाक सभागार में कृषि सूचना तन्त्र के सुदृढ़ीकरण एवं कृषक जागरुकता कार्यक्रम के अंतर्गत रबी उत्पादकता गोष्ठी/कृषि निवेश मेला का आयोजन किया गया। जिसमें कृषि विशेषज्ञों द्वारा किसानों को गौ आधारित शून्य बजट की प्राकृतिक खेती, रबी फसलों की उन्नति तकनीक, फार्मर रजिस्ट्री, फसल बीमा योजना की जानकारी दी गई।बतौर मुख्य अतिथि प्रमुख बृजेश यादव ने कहा कि सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए तमाम योजनाएं चला रही है, उसका लाभ किसान लेकर समृद्धि कर सकते हैं।
उप कृषि निदेशक डा. वीबी द्विवेदी ने किसानों को बताया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि सहित अन्य योजनाओं का लाभ अब उन्ही किसानों को मिलेगा जिनकी फार्मर रजिस्ट्री बन गई है, उन्होंने किसानों से 31 मार्च के पहले फार्मर रजिस्ट्री कराने का सुझाव दिया। उप परियोजना निदेशक आत्मा डा. रमेश चंद्र यादव ने किसानों को सम्बोधित करते हुए कहा कि पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से की जाने वाली खेती को प्राकृतिक/जैविक  खेती कहा जाता है।
जैविक खेती केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है वरन पशुपालन में भी यदि पशुओं को भोजन और दवाइयां इत्यादि प्राकृतिक रुप से उपलब्ध संसाधनों से प्रदान की जाएं तो ऐसे पशुओं के उत्पाद भी जैविक पशु उत्पाद कहलाते हैं। जब जैविक कृषि उत्पादन की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि कृषि उत्पादन के लिए जिन संसाधनों (खाद, कीटनाशक) का उपयोग हो वे सभी प्राकृतिक रुप से ही बने होनी चाहिए इसके लिए गर्मी में गहरी जुताई, बीज शोधन, खरपतवार नियंत्रण, मल्चिंग, पौधों को पोषण गोबर की खाद, हरी खाद, वर्मी कंपोस्ट, पीएसबी कल्चर, माइकोराइजा, राइजोबियम, फसल चक्र का पालन, कीट एवं रोग नियंत्रण हेतु जैविक रोगनाशक/कीटनाशक ट्राइकोडर्मा, ब्यूवेरिया बेसियाना का प्रयोग करें।
उन्होंने प्राकृतिक खेती के मूल सिद्धांतों यथा बीजा मृत, जीवा मृत, मल्चिंग एवं वाफसा की विस्तार से जानकारी दिया।पांच किलो ताजा गाय का गोबर लेकर एक कपड़े की थैली में रखकर एक पात्र में रख दें और पात्र को पानी से भर दे इससे गोबर में विद्यमान सारे तत्व छनकर पानी में आ जाएंगे। दूसरे पात्र में 50 ग्राम चूना लेकर एक लीटर पानी में मिलाएं।
12 से 16 घंटे बाद कपड़े की थैली को दबाकर निचोड़ लें और गोबर अंक के साथ पांच लीटर गोमूत्र मिला दे, 50 ग्राम जंगल की शुद्ध मिट्टी, चूने का पानी और 20 लीटर सादा पानी भी मिला दे। 8 से 12 घंटों तक इस मिश्रण को छोड़ दीजिए इसके पश्चात पूरा मिश्रण छान लें। छना हुआ मिश्रण बीज उपचार के लिए उपयोग करें। वहीं जीवामृत तैयार करने की विधि बताते हुए कहा दस किग्रा गाय का गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 2 किग्रा. गुण तथा एक किग्रा किसी दाल का आटा, एक किग्रा जीवंत मृदा को 200 लीटर जल में मिलाकर पांच से सात दिनों तक सड़ने दें। नियमित रुप से दिन में तीन बार मिश्रण को हिलाते रहे।
एक एकड़ क्षेत्र में सिंचाई जल के साथ प्रयोग करें तो हानिकारक रासायनिक उर्वरकों के बगैर बेहतर उपज ली जा सकती है।गोष्ठी की अध्यक्षता मण्डल अध्यक्ष भाजपा वसन्त मौर्य एवं संचालन एसएमएस नन्द किशोर ने किया।इस मौके पर पूर्व मण्डल अध्यक्ष वंश बहादुर पाल, प्रभारी बीज गोदाम लालबहादुर, प्राविधिक सहायक उमेश चन्द्र, बीटीएम राजेन्द्र पाल, सुभाष द्विवेदी, हीरालाल, रामधनी, अखिलेश पाठक आदि किसान मौजूद रहे।

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