सात साल तक की सजा वाले मामलों में सीधे गिरफ्तारी पर रोक
# पहले नोटिस, गिरफ्तारी आखिरी विकल्प: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया कि जिन अपराधों में अधिकतम सजा सात वर्ष तक है, उनमें पुलिस किसी व्यक्ति को सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले आरोपी को नोटिस देना अनिवार्य होगा। बिना नोटिस की गई गिरफ्तारी को कोर्ट ने कानून के विरुद्ध बताया है। यह फैसला सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले में सुनाया।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी पुलिस का अधिकार जरुर है, लेकिन यह कोई रुटीन या मजबूरी की प्रक्रिया नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35(3) का हवाला देते हुए कहा कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में आरोपी को पहले नोटिस देना जरुरी है। नोटिस के जरिए आरोपी को जांच में पेश होने और सहयोग करने का अवसर दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि भले ही गिरफ्तारी की परिस्थितियां मौजूद हों, फिर भी जब तक बिल्कुल जरुरी न हो, गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए।

पीठ ने साफ किया कि पुलिस केवल पूछताछ के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती। गिरफ्तारी तभी होनी चाहिए, जब पुलिस अधिकारी के पास इसके ठोस और वाजिब कारण हों। यदि आरोपी के खिलाफ अपराध के पर्याप्त साक्ष्य हों, लेकिन बिना हिरासत के जांच आगे बढ़ाई जा सकती हो, तो गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।कोर्ट ने कहा कि पुलिस अपनी मनमर्जी से गिरफ्तारी नहीं कर सकती। गिरफ्तारी की शक्ति को सुविधा के रुप में नहीं, बल्कि एक सख्त कानूनी जरुरत के रुप में देखा जाना चाहिए।

पहले नोटिस और गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प के तौर पर अपनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी नोटिस के बावजूद जांच में सहयोग नहीं करता है, तभी उसकी गिरफ्तारी की जा सकती है। नोटिस के बाद गिरफ्तारी कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपवाद है, जिसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को लेकर कोर्ट ने कहा कि उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे गिरफ्तारी की शक्ति का इस्तेमाल संयम, जिम्मेदारी और कानून के दायरे में रहकर करेंगे।








