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Saturday, February 28, 2026

दुनिया के 97 देश खत्म कर चुके हैं मौत की सजा, भारत की जेलों में बंद हैं मृत्युदंड पाए 574 अपराधी

दुनिया के 97 देश खत्म कर चुके हैं मौत की सजा, भारत की जेलों में बंद हैं मृत्युदंड पाए 574 अपराधी

नई दिल्ली। 
तहलका 24×7 
               आए दिन हत्या दुष्कर्म समेत दिल को दहला देने वाली घटनाएं सामने आती हैं, कोर्ट से ऐसा कृत्य करने वालों को मौत की सजा सुनाई जाती है। भारत में मौत की सजा यानी मृत्युदंड पाने वालों की संख्या 2016 से अब तक 574 है।ताजा मामला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का है, जहां बच्चों के यौन शोषण के मामले में जेई रामभवन और उसकी पत्नी को मृत्युदंड दिया गया है।
कोर्ट से अपराधियों को मृत्युदंड तो दे दिया जाता है लेकिन, इनको मौत नहीं मिल पाती,क्योंकि, मानवाधिकार और सामाजिक संगठन इसका कड़ा विरोध करते हैं और मृत्युदंड को खत्म करने की सालों से मांग उठा रहे हैं।यही कारण है कि दुनिया के 97 देश मौत की सजा को खत्म कर चुके हैं।लेकिन,अभी भारत में ये लागू है।हालांकि 2020 के बाद से देश में किसी को फांसी नहीं दी गई।दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक शोध के आंकड़ों के अनुसार आजादी के बाद से अब तक 755 खूंखार अपराधियों को फांसी के तख्ते पर मौत की नींद सुलाया गया।
आईये जानते हैं फांसी के फंदे पर लटकाए गए इन खूंखार अपराधियों की क्या कहानी थी?भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत कानूनी रुप से मृत्युदंड स्वीकृत है। मृत्युदंड मुख्य रुप से हत्या, आतंकवाद से संबंधित अपराध, पॉक्सो अधिनियम के तहत नाबालिग से दुष्कर्म, राजद्रोह जैसे अपराधों के लिए दिया जाता है।भारत के संविधान में कहा गया है कि जीवन अनमोल है।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में इसे संरक्षित किया गया है।
लेकिन ये भी कहा गया है कि भारत में किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। लॉ जर्नल के अनुसार भारत में आजादी के बाद पहली फांसी रघुराज सिंह उर्फ राशा को दी गई। राशा को 9 सितंबर 1947 को जबलपुर केंद्रीय जेल में फांसी दी गई थी। राशा को फांसी की सजा हत्या के जुर्म के लिए दी गई थी। लेकिन ये जुर्म उसने क्यों और किन परिस्थितियों में कैसे किया था? इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।
आजाद भारत में फांसी पर चढ़ाई जाने वाली पहली महिला रतनबाई जैन थी, जिसे 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। रतनबाई जैन को 3 लड़कियों को जहर देकर मारने के जुर्म में मौत की सजा दी गई थी। रतनबाई जैन एक परिवार नियोजन क्लिनिक में प्रबंधक थी। वो 3 लड़कियां भी क्लिनिक में काम करती थीं। उसे शक था कि इन तीनों लड़कियों का उसके पति के साथ अवैध संबंध है। इसी शक में उसने तीनों को मार दिया। उसने लड़कियों की गला काटकर या चाकू मारकर हत्या नहीं की बल्कि, जहर का इस्तेमाल किया।
उसने लड़कियों के खाने या पेय पदार्थों में जहर मिला दिया था। उस घातक रसायन का सेवन करने के बाद तीनों की तुरंत मृत्यु हो गई थी। एनएएलएसएआर रिपोर्ट में 2016-2025 यानी 10 साल का विश्लेषण जारी किया है। इसके अनुसार 2025 के अंत तक भारत में 574 लोग मौत की सजा का सामना कर रहे थे और जेल की काल कोठरी में जिंदगी बिता रहे हैं. यह इस सदी की शुरुआत के बाद से मौत की सजा पाए लोगों की सबसे अधिक संख्या है। 2025 में मौत की सजा सुनाए जाने की संख्या भी सबसे अधिक रही। 2025 में विभिन्न अदालतों ने 94 केस में 128 को मौत की सजा सुनाई है. इसमें 118 पुरुष और 10 महिला अपराधी शामिल हैं।
दिल्ली में 1978 में एक नौसेना के अधिकारी के बेटे संजय चोपड़ा और बेटी गीता की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी। इसके दोषी जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला और कुलजीत सिंह उर्फ रंगा को 31 जनवरी 1982 को फांसी दी गई। दोनों ने बच्चों का अपहरण फिरौती के लिए किया था, लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके पिता नौसेना अधिकारी हैं, तो दोनों की हत्या कर दी। गीता के साथ हत्या से पहले दुष्कर्म किए जाने की बात भी सामने आई थी। लेकिन फोरेंसिक साक्ष्य इसकी पुष्टि नहीं कर सके।
रंगा-बिल्ला ने भी शुरु में दुष्कर्म की बात स्वीकारी थी लेकिन, बाद में बयान से पलट गए थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसकी साजिश रचने में 6 जनवरी 1989 को सतवंत सिंह और केहर सिंह को 31 अक्टूबर 1984 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। सतवंत और बेअंत सिंह ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के प्रतिशोध में यह हत्या की थी। दोनों को इस मामले में दोषी पाया गया था।ओडिशा के मयूरभंज जिले के लक्ष्मण नायक ने अपनी 9 साल की भतीजी की दुष्कर्म करने के बाद बेरहमी से हत्या कर दी थी। उसने यह कृत्य नशे की हालत में किया था।
इस मामले में मयूरभंज सत्र न्यायालय ने लक्ष्मण नायक को दोषी मानते हुए मृत्युदंड दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। इसके बाद 16 जुलाई 1994 को उसे फांसी पर लटका दिया गया था। तमिलनाडु का ऑटो शंकर एक सीरियल किलर था, जिसका असली नाम गौरी शंकर था। वह ऑटो चलाता था, जिसकी वजह से उसका नाम ऑटो शंकर पड़ गया था।युवा लड़कियों को वह अपना शिकार बनाता था। पहले वह उनका अपहरण करता। फिर दुष्कर्म करके हत्या कर देता था और शवों को जला या दफना देता था।
उसने 1988-89 में 6 लोगों की हत्या की थी। 1991 में चंगलपट्टू सत्र न्यायालय ने उसे मौत की सजा सुनाई। सभी अपीलों को खारिज करने के बाद उसे 27 अप्रैल 1995 को सलेम सेंट्रल जेल में फांसी दी गई।कोलकाता के रहने वाले धनंजय चटर्जी को स्कूल की छात्रा की दुष्कर्म के बाद हत्या करने का दोषी मानते हुए निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। सभी अपीलों को खारिज करने के बाद 14 अगस्त। 2004 को धनंजय चटर्जी को पश्चिम बंगाल की अलीपुर केंद्रीय जेल में फांसी दी गई। जिस दिन उसे फांसी दी गई उस दिन उसका 42वां जन्मदिन था।
2008 में मुंबई में आतंकी हमला हुआ, समुद्र के रास्त मुंबई में घुसे लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, ताज महल पैलेस होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट, लियोपोल्ड कैफे, कामा अस्पताल और नरीमन हाउस में गोलियां बरसाकर 166 से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी। 4 दिन तक चले सिलसिलेवार हमले में 300 से अधिक लोग घायल भी हुए थे। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में सभी आतंकवादी मारे गए थे। सिर्फ अजमल आमिर कसाब जिंदा पकड़ा गया था।उसे पुणे की यरवडा जेल में 21 नवंबर 2012 फांसी दी गई।
संसद पर हमला 13 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के 5 आतंकवादियों ने हमला किया था। सभी एक कार से संसद परिसर में घुसे और ताबड़तोड़ गोलियां चलानी शुरु कर दी थी। इसमें दिल्ली पुलिस के 6 जवान, संसद सुरक्षा सेवा के 2 जवान और एक माली शहीद हो गए थे। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में सभी पांचों आतंकवादी मारे गए थे। हमले की साजिश रचने और आतंकवादियों को मदद का दोषी अफजल गुरु को पाया गया था। उसे 9 फरवरी 2013 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया गया।
बॉम्बे (अब मुंबई ) में 12 मार्च 1993 को सिलसिलेवार 12 बम धमाके हुए थे। आतंकी घटना में 257 लोगों की मौत हुई थी और 1,400 लोग घायल हुए थे। इन हमलों का साजिशर्ता अपराध सिंडिकेट डी-कंपनी का मुखिया दाऊद इब्राहिम था। श्रृंखलाबद्ध बम धमाके करने की जिम्मेदारी याकूब मेमन पर थी। उसी ने इसके लिए आदमी और सामग्री जुटाई थी। कोर्ट याकूब मेमन को दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद नागपुर की जेल में 30 जुलाई 2015 को उसे फांसी दे दी गई। दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को चलती बस में एक 23 साल की युवती के साथ दुष्कर्म किया गया था।
दरिंदगी के बाद युवती को इस कदर यातनाएं दी गईं कि उसकी मौत हो गई। दुष्कर्म और हत्या के इस मामले में मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, पवन गुप्ता को दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई गई। घटना के करीब 8 साल बाद 20 मार्च 2020 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में चारों दोषियों को एक साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।दुनिया के 97 से अधिक देश अपने यहां मृत्युदंड को खत्म करने की घोषणा कर चुके हैं। 31 दिसंबर 2024 को जिम्बाब्वे ने आधिकारिक तौर पर मृत्युदंड को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।
इसके बाद लगभग 60 कैदियों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया।यह कदम 20 वर्षों से देश में फांसी न दिए जाने के बाद उठाया गया था।इसके पहले जाम्बिया ने 2023 में फांसी की सजा को समाप्त किया था।इससे और पहले सिएरा लियोन,कजाकिस्तान, पापुआ,न्यू गिनी और घाना जैसे देशों ने मृत्युदंड खत्म किया था।वेनेजुएला पहला देश था जिसने मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त किया था। उसने 1863 में ही इसकी घोषणा कर दी थी। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब, ईरान, चीन, उत्तर कोरिया और यमन को दुनिया में सबसे क्रूर और अधिक संख्या में मृत्युदंड देने वाले देशों में गिना जाता है।
सऊदी अरब में सरेआम सिर कलम करने की विधि अत्यंत क्रूर मानी जाती है। जहां 2022 में 147 से अधिक लोगों को फांसी दी गई थी। ईरान में भी सार्वजनिक फांसी और अत्यधिक सजाएं दी जाती हैं। कोई भी देश कानूनी सुधारों, अंतरराष्ट्रीय संधियों के समर्थन और जन-जागरूकता के जरिए मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त कर सकता है। इसके लिए सबसे पहले फांसी पर कानूनी रोक लगाना जरूरी है। फिर कानून बदलकर मृत्युदंड की जगह ‘बिना राहत के आजीवन कारावास’ जैसे दंड का प्रावधान करना और मानवाधिकारों के तहत इसे संवैधानिक रुप से निषिद्ध किया जा सकता है।

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