चुनाव जिताऊ और जनता के मुद्दों में इतनी तफ़ावत क्यों है?
# विचारमंथन ! वरिष्ठ पत्रकार मंगलेश्वर (मुन्ना) त्रिपाठी की कलम से…
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने इस सवाल को फिर रेखांकित किया है कि चुनाव जिताने वाले मुद्दे और अमूमन जनता के समझे जाने वाले मुद्दों में इतनी तफ़ावत क्यों है? बुद्धिजीवी जिन्हें असल मुद्दे मानकर परसेप्शन का जो महल खड़ा करते हैं, आम आदमी उससे वैसा इत्तफाक क्यों नहीं रखता, जो नतीजों को भी उसी के मुताबिक उलट दें? पिछले कुछ सालों में यह देखने में आ रहा है कि आम आदमी की जिंदगी से जुड़े मुद्दे तथा जद्दोजहद कुछ और है लेकिन उसका चुनावी जनादेश कुछ और होता है? इसी से यह सवाल भी नत्थी है कि वोटर आखिर किस बात से प्रभावित होकर अपना वोट देता है, अपना राजनीतिक मन बनाता है? इसको लेकर बौद्धिक जुगाली करने वाले ज्यादा समझदार हैं या फिर वोटर ज्यादा समझदार है? अथवा यह केवल समाज के एक वर्ग द्वारा ‘बिल्ली’ को ‘बाघ’ के रूप में देखने- दिखाने की कवायद है, जिससे आम वोटर ज्यादा इ्त्तफाक नहीं रखता?ये तमाम सवाल इसलिए क्योंकि पांच राज्यों में से यूपी में जिन मुद्दों को लेकर सत्ता परिवर्तन की हवा बनाई जा रही थी, वो जमीन पर नदारद दिखी।

यहां हम राजनेताओं के बढ़-चढ़ कर किए जाने वाले दावों और वादों की बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन एक साथ यूपी सहित चार राज्यों में भाजपा की तमाम एंटी इनकम्बेंसी के बावजूद सत्ता में वापसी कोई साधारण बात नहीं है। पिछले डेढ़ साल से एक बड़ा मुद्दा यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में किसान आंदोलन का था। बेशक तीन विवादित कृषि कानूनो को लेकर भाजपा के प्रति किसानों में नाराजी थी। इसे लेकर देश की राजधानी दिल्ली की सरहदों पर साल भर से ज्यादा समय तक आंदोलन चलाया गया। माहौल यूं बनाया गया कि अगले चुनावों में यही एक निर्णायक मुद्दा साबित होने वाला है। इसका एक संदेश यह भी था इस देश का किसान इतना स्वार्थी है कि उसे अपनी उपज के बेहतर मूल्य पाने और अपने संघर्ष से ज्यादा किसी से मतलब नहीं है। यह सोच उसी तरह की है, जैसे कि मनुष्य के वजूद को केवल पेट में समेट देना या मनुष्यता को राष्ट्र की पहचान में विलीन कर देना। यह आसानी से भुला दिया गया कि किसान भी इस देश का जिम्मेदार वोटर है।

उसकी दुनिया फसल की उपज से आगे भी है। वह भी दूसरे मुद्दों पर अपने ढंग से सोचता है। समग्रता में चीजों को आंकता है, तौलता है। वैसे भी जो दूसरे के लिए अन्न उपजाता हो, वो अपने स्वार्थ तक सीमित रह ही नहीं सकता।बेशक किसान आंदोलन, एक बड़ा आंदोलन था, लेकिन वही सब कुछ नहीं था। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया। साल भर तक किसान आंदोलन संचालित करने वाले संयुक्त किसान मोर्चे के तहत आने वाले 25 किसान संगठनो ने नया ‘संयुक्त समाज मोर्चा’ बनाकर पंजाब में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए। सीट जितना तो दूर, शायद उन सभी की जमानत जब्त हो गई। यानी किसानों ने ही उन्हें वोट नहीं दिए। यानी किसान की नाराजी किसान मोर्चे के पक्ष में ही ट्रांसलेट नहीं हुई। उधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट किसानों की नाराजी को ‘भाजपा का काल’ बताया जा रहा था, वैसा भी कुछ देखने को नहीं मिला।

नतीजों के बाद बड़बोले किसान नेता नरेश सिंह टिकैत कहीं नजर नहीं आए। कहा जा सकता है कि भाजपा के हिंदुत्व के आग्रह ने पश्चिमी यूपी में वैसा मुस्लिम-जाट समीकरण नहीं बनने दिया, जैसा कि बताया जा रहा था। भाजपा ने इस मुद्दे की गहराई को शायद पहले ही भांप लिया था। इसीलिए चुनाव के तीन माह पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेकर मुद्दे की सियासी हवा निकाल दी। अगर पंजाब की बात करें तो जिन कृषि कानूनों के विरोध और बरसो राज्य में सत्ता में रहा अकाली दल एनडीए से अलग हुआ, उसे भी किसानों ने चुनाव में वोट नहीं दिए। उसके तो सभी सेनापति भी धराशायी हो गए। यही नहीं वहां सत्तारूढ़ कांग्रेस ने किसान आंदोलन को खुलकर समर्थन दिया था। लेकिन न तो किसानों और न ही किसानों का आंदोलन चलाने वालों ने कांग्रेस को वोट दिया। उन्होंने कांग्रेस की जगह उस आम आदमी पार्टी को बंपर समर्थन दिया, जो किसान आंदोलन का समर्थन तो कर रही थी, लेकिन बहुत खुलकर सामने भी नहीं आ रही थी। पंजाब में आप और यूपी-उत्तराखंड में किसानों द्वारा भाजपा को बड़े पैमाने पर वोट करने का अर्थ क्या निकाला जाए? किसान नामसझ हैं या फिर जिस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभारा गया, उसमें वैसा चुनावी दम नहीं था, जैसा पेंट किया जा रहा था? इसका अर्थ यह कतई नहीं कि किसानों की समस्या को नजर अंदाज किया जाए या उसके प्रति असंवेदनशील हुआ जाए। लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि खुद किसान और आम आदमी किन मुद्दों को लेकर ज्यादा संवेदनशील है, जो उसे सत्ता परिवर्तन के लिए विवश कर दे।

यहां प्रश्न यह भी है कि हमें मुद्दों को किस लैंस से देखना चाहिए? उसे कितना मैग्नीफाय करके समझना चाहिए? सवाल यह भी उठता है कि किसान आंदोलन या शाहीन बाग जैसे आंदोलन अपने आप में सचमुच उतनी गहराई और व्यग्रता लिए होते भी हैं या नहीं या फिर वो केवल राजनीतिक प्रयोगशाला का एक और प्रयोग भर होते हैं। जिसमें आम आदमी इस्तेमाल हो जाता है।यकीनन इस देश का वोटर कथित चिंतकों से ज्यादा समझदार और जमीन के करीब है। क्योंकि वो अपनी जायज समस्याओं के बरक्स उन कोणों से भी सोचता है, जो चुनाव नतीजों की दिशा तय करते हैं। दूसरी तरफ ज्यादातर राजनेता अभी भी चुनावी समीकरणों को अंकगणित का फार्मूला मानकर चलते हैं। यूपी और पंजाब के चुनाव ने उसे भी ध्वस्त किया है। परिणामों के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे वो महाबड़बोले जातिवादी नेता परिदृश्य से गायब दिखे, जिन्होंने अमिताभ बच्चन के उस अमर डायलाॅग कि ‘हम जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है’ की तर्ज पर ये दावा किया था कि वो जिस पार्टी में शामिल होते हैं, वही सत्ता सिंहासन पर सवार होती है। यकीनन इस बार अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी ने जातियों का कागजी समीकरण अच्छा तैयार किया था, उसका चुनाव प्रदर्शन भी पहले की तुलना में बेहतर रहा, सत्तावरण के हिसाब से जमीनी हकीकत कुछ और थी। आम आदमी योगी राज और उनके पूर्ववर्तियों के राज की मन ही मन तुलना कर रहा था और तमाम खामियो के बाद भी उसे बेहतर पा रहा था। लिहाजा उसने योगी को एक मौका और दे दिया।


















