ख़ामेनेई की मौत की गूंज बाराबंकी के किंतूर तक
# एक गांव, एक विरासत और एक सदी पुराना रिश्ता
किंतूर, बाराबंकी।
तहलका 24×7
दुनिया के नक्शे पर एक ओर है तेहरान: राजनीति, धर्म और वैश्विक संघर्षों का केंद्र।दूसरी ओर है उत्तर प्रदेश का बाराबंकी ज़िला: खासकर उसका शांत, साधारण-सा दिखने वाला किंतूर गांव।लेकिन इन दोनों के बीच जो रिश्ता है,वो न खून से कमजोर है,न वक्त से धुंधला।और जब ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की खबर इजरायली हमले के बाद सामने आई,तो किंतूर गांव भी उसी तरह कांप उठा, जैसे कोई अपनों को खो देता है।

यह महज एक अंतरराष्ट्रीय समाचार नहीं था। यह था किंतूर की मिट्टी से उठे एक वंशज के अंत की ख़बर, जो कभी यहीं के कच्चे मकानों, धूलभरी पगडंडियों और तुलसी के आंगनों से निकलकर फारसी सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचा था।गांव के बुजुर्ग मौलाना रज़ा हुसैनी की आंखे नम हो गईं जब उन्होंने कहा,”सैयद अहमद मुसावी हिंदी,जो ख़ामेनेई साहब के दादा थे,वे हमारे गांव के ही थे।हम उन्हें बुज़ुर्गों से सुनते आए हैं।आज जब उनका वंशज नहीं रहा, तो ऐसा लग रहा है जैसे खुद गांव का कोई बेटा चला गया हो।

“जैसे ही यह खबर चैनलों और सोशल मीडिया पर तैरकर गांव तक पहुंची, कुछ लोग टेलीविजन के सामने जमा हो गए, कुछ ने मोबाइल से लाइव स्ट्रीम देखा।किंतूर में एक शोकसभा जैसा माहौल बन गया।गांव के छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने इस खबर को सिर झुकाकर स्वीकार किया,जैसे किसी अपने की मौत की सूचना आई हो।कई गांव वालों के घरों में आज भी पुराने फारसी दस्तावेज, हस्तलिखित कुरान और जर्जर तस्वीरें रखी हैं, जिन्हें वे सैयद वंश की निशानियां मानते हैं।

यह केवल ऐतिहासिक गौरव नहीं है,यह है एक सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी संभाला गया है।इस अंतरराष्ट्रीय घटना ने गांव के लोगों को वैश्विक राजनीति से जोड़ दिया है।किंतु भावनात्मक स्तर पर, अखबार की सुर्खियों से नहीं,दिल के रिश्ते से।गांव के नौजवान अब गूगल पर ईरान के बारे में पढ़ रहे हैं, ख़ामेनेई के भाषण देख रहे हैं,और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि दुनिया में उनकी‘अपनी जड़ों’की गूंज कहां तक जाती है।

इतिहास की तरफ नजर डालें तो, सैयद अहमद मुसावी हिंदी जो अली ख़ामेनेई के दादा थे,18वीं-19वीं सदी में भारत (किंतूर) से ईरान गए।उन्होंने ‘हिंदी’ उपनाम इसी सम्मान में अपनाया, कि वे भारत से हैं।फारसी और शिया परंपराओं में उन्हें आज भी महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कड़ी के रूप में याद किया जाता है।इस घटना ने किंतूर को एक नई पहचान दी है।सिर्फ एक ऐतिहासिक गांव नहीं,बल्कि एक वैश्विक विरासत का जीवित प्रतीक। शायद यही कारण है कि जब तेहरान में मातम हुआ,तब बाराबंकी के एक छोटे से गांव में भी उसी दर्द की लहर दौड़ पड़ी।







