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Friday, November 28, 2025

देह पर लगी चोटें भारतीय लोकतंत्र की एक्स-रे तस्वीर बन गई

देह पर लगी चोटें भारतीय लोकतंत्र की एक्स-रे तस्वीर बन गई

# हिडमा और राजे की चिता पर फूट-फूूटकर रोती रही सोनी सोरी, पुलिस ने यौन-प्रताड़ना दी तो माओवादियों ने तेजाब से नहलाया

कुमार सौवीर
स्वतंत्र पत्रकार
तहलका 24×7
             वह एक तरफ तो सरकारी शह पाये पुलिस की दरिंदगी से जूझ रही थी, दूसरी ओर माओवादियों से लड़ रही थी। दोनों ने ही उसका जीना हराम कर दिया था। पुलिस ने उसके साथ कई दिनों तक शारीरिक प्रताड़ना दी। उसे हिरासत में पीटा, उसके गुप्तांगों में डंडा और कंकड़-पत्थर तक भर दिया। उधर माओवादियों ने उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया और जब वह चुनाव के मैदान में उतरी तो उन्हीं माओवादियों ने उसके खिलाफ फतवा जारी कर दिया।
लेकिन जब इन्हीं माओवादियों का शीर्ष नेता माड़व हिडमा और उसकी पत्नी को पुलिस ने एनकाउंटर के नाम पर मार डाला, तब उनकी चिता पर वह फूट-फूट कर रोयी।नाम है सोनी सोरी। वह औरत जो न तो राज्य  हिंसा को माफ कर सकी, न माओ-क्रूरता को। बस्तर का जंगल बहुत कुछ सह लेता है, गोलियां, साज़िशें, चुप्पियां, लेकिन कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जिन्हें न जंगल निगल पाता है, न राज्य। सोनी सोरी की आवाज उन्हीं में है। कच्ची, टूटी और इतनी सच्ची कि सत्ता उससे डरती है।
यह उस औरत की आवाज है जिसे पुलिस ने नंगा किया, बिजली से झटका दिया, गुप्तांगों में पत्थर ठूंसे, यह सब झेलने के बाद भी उसे जिंदा रहना पड़ा। क्योंकि मरा हुआ सच किसी काम का नहीं होता। 1975 में बाड़े-बेदमा गांव में पैदा हुई यह कोया लड़की कांग्रेस समर्थक, नक्सल-विरोधी परिवार से आई थी। पिता मुंद्रा राम सोरी ने दशकों तक पुलिस को सूचना दी, सरपंच रहे और मुखबिरी की कीमत माओवादियों की गोली ने चुकाई।विडंबना देखिए, जिस राज्य के लिए पिता ने जान जोखिम में डाली, उसी राज्य ने बेटी को सबसे बेरहम सजा दी।
बस्तर में निष्ठा का कोई मूल्य नहीं, बस संदेह की उम्र लंबी होती है। सत्रह-अठारह साल की उम्र में सोनी को प्यार हुआ। नागपुर के छोटे व्यापारी अनिल फुटाने से। परिवार ने रोका, पर वह नहीं मानी। शादी कर ली। पहले दो साल घरवालों ने मुंह फेर लिया। फिर मुस्कान पैदा हुई, सब मान गए। तीन बच्चे हुए। मुस्कान, दीपेंद्र, अक्सरा। सबने मां का सरनेम रखा, कोया रिवाज। जीवन सादा था। 2002 से वह सरकारी कन्या आश्रमों में लड़कियों को पढ़ाती थीं। सुबह गोण्डी गीत, शाम को बच्चे। फिर 2010 आया और सब छिन गया।
पुलिस ने कहा मुखबिरी करना शुरु करो। सोनी ने मना कर दिया। भतीजा लिंगाराम कोडोपी ने भी मना कर दिया। बस यही इनकार काफी था। 4 अक्टूबर 2011 को दिल्ली से पकड़ी गई। आरोप गढ़ा गया कि उसने एस्सार कंपनी से माओवादियों को पंद्रह लाख पहुंचाए। दंतेवाड़ा लाकर जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय है। एसपी अंकित गर्ग की मौजूदगी में उन्हें नंगा किया गया, बिजली के झटके दिए गए, तीन पत्थर योनि और गुदा में ठूंसे गए। हालत इतनी बुरी थी कि कोलकाता मेडिकल कॉलेज में वह पत्थर सर्जरी से निकाले गए।
सुप्रीम कोर्ट ने यातना का आरोप मान लिया। पर उसी अधिकारी को 2012 में गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति पुलिस पदक मिला। आज चौदह साल बाद भी अंकित गर्ग आईजी हैं, एंटी-नक्सल ऑपरेशंस के। यह वही भारत है जहां अपराध कभी-कभी पदक पहनकर घूमता है।इसी बीच पति अनिल को भी पकड़ा गया, मारा-पीटा गया। रिहा हुए तो दो महीने में मर गए। मां जेल में बेटी की याद में मर गई। बच्चे टूटते बचपन से गुजरे। सोनी का पूरा घर खाली हो गया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली तो वह जेल से निकलीं और सीधे लोकतंत्र की लड़ाई में उतर गईं। आम आदमी पार्टी ज्वाइन की, बस्तर से चुनाव लड़ा।
जंगल तक में सवाल था कि सोनी किसकी दुश्मन हैं? राज्य की या माओवादियों की? सच यह था कि वह दोनों की असुविधा बन चुकी थीं। सत्रह हजार के करीब वोट पड़े। बस्तर में यह आंकड़ा नहीं, जान का जोखिम था। 2019 में पार्टी छोड़ दी। अब वह किसी की नहीं, सिर्फ़ उन आदिवासी औरतों की हैं जिनकी चीखें थाने और जंगल दोनों में खो जाती हैं। दुनिया ने भी उनकी पीड़ा को देखा और सम्मान दिया। 2012-13 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन्हें “जूझारू सत्य योद्धा” घोषित किया। यानी वह कैदी जो सिर्फ़ सच बोलने की सज़ा काट रहा हो।
2018 में आयरलैंड के डबलिन में सम्मान मिला, वह सम्मान जो दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में मानवाधिकार के लिए जान जोखिम में डालने वालों को दिया जाता है। सोनी उस दिन मंच पर खड़ी थीं, चेहरे पर 2016 के हमले के निशान अभी भी थे। कहा “यह पुरस्कार मेरा नहीं, उन सैकड़ों आदिवासी औरतों का है जिनकी चीख कोई नहीं सुनता।”आज भी वह दंतेवाड़ा से जगरगुंडा तक पैदल घूमती हैं। फर्जी मुठभेड़ों के पीड़ितों को मुआवजा दिलाती हैं, बलात्कार पीड़ित लड़कियों की रिपोर्ट थाने में दर्ज करवाती हैं। सुकमा में मारे गए जवानों के दो अनाथ बच्चे हिंगा और ब्रिशा तो उनके अपने बच्चे जैसे हैं।
2016 में किसी ने उनके चेहरे पर तेजाबी रसायन फेंका था। आज भी धमकियां आती हैं। आय अनिश्चित है।
कभी खेती, कभी पुरस्कार की राशि, कभी किसी संगठन की मदद। लेकिन उनकी आवाज की ताकत इस अनिश्चितता से कहीं ज़्यादा मजबूत है। सोनी सोरी किसी क्रांतिकारी दस्ते की मुखिया नहीं हैं। वह एक शिक्षिका थीं, जिसे राज्य ने नंगा करके पत्थर ठूंस दिए थे। वह एक मां हैं, जिसका पति हिरासत में मारा गया। वह एक नागरिक हैं, जिसे वर्दी और जंगल दोनों ने अपना दुश्मन मान लिया। इसीलिए उनका सवाल सिर्फ बस्तर का नहीं है।
जब राज्य अपने नागरिकों को यातना देने लगे, अंतर्राष्ट्रीय संगठन उंगली उठाएं और फिर भी अपराधी को पदक मिले, तो नागरिक आखिर किस पर भरोसा करे? सोनी का जवाब वही है। वह फिर वोट मांगने निकली थीं और आज भी लोकतांत्रिक रास्ते पर हैं। यह सबसे खतरनाक जवाब है। क्योंकि यह बंदूक की भाषा नहीं बोलता, यह उस साहस की भाषा बोलता है जो मारा नहीं जा सकता। जब तक सोनी सोरी सांस ले रही हैं, बस्तर की कोई भी चीख अकेली नहीं पड़ेगी। जब तक उनकी आवाज है, बस्तर चुप नहीं होगा। लगातार सिंहनाद करता ही रहेगा कि जय बस्तर, जय हिंद।

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