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Monday, February 16, 2026

पहलगाम नरसंहार: कश्मीर घाटी में पहली बार आतंकवाद के विरोध में बंद ‘एक छलावा’

पहलगाम नरसंहार: कश्मीर घाटी में पहली बार आतंकवाद के विरोध में बंद ‘एक छलावा’

# वर्ष 1990 में कश्मीरी पंडितों की हत्या, पलायन और धर्मांतरण से बदल दी गई डेमोग्रेफी, पांच अगस्त 2019 के बाद जम्मू कश्मीर में विस चुनाव कराना वर्तमान केन्द्र सरकार की चूक का नतीजा है पहलगाम की घटना, यहीं छिपे थे आतंकी और आबाद हैं उनके स्लीपर सेल: स्वामी चिन्मयानंद

कैलाश सिंह
राजनीतिक संपादक
लखनऊ/ दिल्ली।
तहलका 24×7 
              कश्मीर घाटी के पहलगाम में धर्म पूछकर हुए नरसंहार की हृदयविदारक घटना पर दुनिया के सभी देशों ने दुःख जताया। अधिकतर देशों ने तो आतंकवाद की जड़ बने पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदम उठाने में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खुलकर साथ देने का भी ऐलान कर दिया।घटना के बाद जिस तरह पाकिस्तान के जनरल ने अपने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में कहा कि हिन्दू-मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि मुस्लिम ऊंची कौम है।
ऐसे ही तमाम शब्द बोलकर उन्होंने दुनिया के मंच पर पाकिस्तान को आतंकवाद के पर्यायवाची के रुप में स्थापित कर दिया।अब भारत की मूक किंतु सख्त कदम उठाने की शुरुआत से जहां पाकिस्तान में दहशत बढ़ गई है वहीं, वहां के जनरल समेत तमाम नेताओं की भाषा बदलने लगी है।दरअसल भारत की आज़ादी के बाद वर्ष 1990 में जब कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों, वहां के हिंदुओं का कत्लेआम यानी नरसंहार, महिलाओं से रेप, उनके घरों को जलाने और उन्हें पलायन को विवश करने वाली घटनाओं से तो पूरा देश वाक़िफ़ है, लेकिन इसमें जितना दोषी अब्दुल्ला और मुफ़्ती का परिवार रहा है उससे कम तत्कालीन कांग्रेस सरकार भी नहीं रही।
इस तरह तीन राजनीतिक दलों की जानकारी में कश्मीर घाटी की डेमोग्रेफी चेंज कर दी गई। भाजपा की मोदी सरकार ने पांच अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35ए हटाकर असम्भव को संभव तो कर दिखाया, लेकिन बाद में वहां एसेंबली का चुनाव कराने से पूर्व बदली हुई डेमोग्रेफी को पहले की तरह स्थापित न कर पाने की चूक कर दी।इस मुद्दे पर ‘तहलका संवाद’ से हुई खास बातचीत में अटल सरकार के दौरान केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहे स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती ने खुलकर कहा कि पहलगाम की घटना ने आतंक और आतंकवाद की सारी हदें पार कर दी हैं।
घटना के विरोध में पहली बार ‘कश्मीर घाटी में बंद’ का आह्वान बदली हुई परिस्थितियों का नतीजा है। इसे उमर अब्दुल्ला सरकार का अपने बचाव में छलावा मात्र कहना अनुचित नहीं होगा। क्योंकि जब कश्मीरी पंडितों का नरसंहार कर उन्हें भगाया, जलाया और अपना घर छोड़ने को विवश किया जा रहा था तब ऐसे विरोध करने वाले कहां थे? पहलगाम में धर्म पूछकर हिंदुओं की हत्या के बाद पाकिस्तान से आये बयान ने साबित कर दिया कि आतंकवाद का भी धर्म होता है, जिसे इस्लाम और पाकिस्तान कहने में अब कोई संकोच नहीं होगा।
भारत सरकार के लिए अब धैर्य रखने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। कश्मीर घाटी में आज भी आतंकियों को पनाह देने वालों की पूरी जमात है।इसकी गवाही घटना के बाद से छोटे दुकानदारों का लापता होने से मिलती है। उन्होंने कहा उमर अब्दुल्ला को डर सता रहा है कि कहीं हमारी सरकार को निलम्बित करके यहां राष्ट्रपति शासन न लगा दिया जाए! यही वाजिब भी है क्योंकि घटना के समय राज्य की पुलिस कहां थी? अब बन्द करके यह जताना कि हम भी घटना के विरोध में हैं, तो यह उनका अपना भय है।
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के अनुसार छोटे व्यापार में लगे तमाम लोग दहशतगर्दों के स्लीपर सेल सरीखे काम करते रहे हैं, अन्यथा इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने वाले धर्म पूछकर लोगों की जिंदगी लेते रहे और कोई विरोध में क्यों नहीं आया। ऐसा नहीं है कि हमलावर उसी दिन पाकिस्तान से आये और नरसंहार करके लौट गए, इनको पनाह भी घाटी में ही मिली थी। यह सोचने की बात है कि कोई आतंकी किसी परिवार को बंधक बनाकर दो-चार दिन तो पनाह ले सकता है, लेकिन महीनों पनाह में रहने और स्लीपर सेल बनाने के लिए पनाह देने वाले भी उनके गिरोह से जुड़े होने चाहिए।

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