पीड़ित को संरक्षण देने के बजाय दबंग की ढाल बन रही पुलिस
# पद का दुरुपयोग कर पीड़ित के विरुद्ध फर्जी कार्यवाही का दबाव बनाए पुलिस के अधिकारी
जौनपुर।
डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
तहलका 24×7
जिले के सरपतहा थाना क्षेत्र स्थित बासगांव से एक ऐसा मामला प्रकाश में आया है, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और पारदर्शी प्रशासन के दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। यहां पुश्तैनी जमीन के बंटवारे को लेकर उपजा विवाद अब महज एक पारिवारिक झगड़ा नहीं रह गया है, बल्कि रसूख और पद के दुरुपयोग का नग्न प्रदर्शन बन चुका है।जिसमें पीड़ित ने पुलिस पर गम्भीर आरोप लगाए हैं।

पीड़ित ऋषिकेश मिश्रा ने आरोप लगाया है कि इस पूरे विवाद के पीछे असली मास्टरमाइंड गौरीशंकर मिश्रा है, जो न केवल उनकी पुश्तैनी जमीन हड़पना चाहता है, बल्कि अपने रसूख के दम पर पूरे सिस्टम को ही गुमराह करने में जुटा है कथित तौर पर जानकारी है कि गौरीशंकर मिश्रा के दामाद जीएसटी में असिस्टेंट कमिश्नर हैं और उनके चाचा उत्तर प्रदेश पुलिस के खुफिया विभाग में डीआईजी हैं, जिनकी पैरवी से मामला तब और गंभीर हो गया जब पीड़ित के अकेलेपन का फायदा उठाते हुए उस पर मानसिक और शारीरिक दबाव बनाया जाने लगा, जबकि उसके पिता अपने बीमार पिता (ऋषिकेश के दादा) की सेवा के लिए मुंबई में हैं।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में स्थानीय पुलिस निष्पक्षता से कार्यवाही नहीं कर पा रही है और जनपदीय अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।सूत्रों का कहना है कि आरोपी गौरीशंकर मिश्रा स्वयं थाने पहुंचकर अपने दामाद की रसूख का लाभ ले कर पुलिस पर इस बात का दबाव बना रहा है कि पीड़ित ऋषिकेश के खिलाफ ही फर्जी मुकदमा दर्ज किया जाए। इतना ही नहीं,जिले के कुछ बड़े अधिकारियों के फोन भी थाने के नंबरों पर घनघना रहे हैं और पुलिस पूरी तरह से दबाव में दिखाई पड़ने लगी,इससे मामले का रुख मोड़ा जा चुका है।

सवाल यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश की पुलिस अब संविधान और कानून की धाराओं के बजाय ‘ऊपर’ से आने वाले सिफारिशी फोन कॉल्स पर काम करेगी? यदि एक पीड़ित अपनी जमीन और जान की गुहार लेकर थाने जाता है और वहां उसे ही दोषी बनाने की पटकथा पहले से तैयार मिलती है,तो आम जनमानस का खाकी से भरोसा उठना लाजमी है।यह कोई इकलौता मामला नहीं है,बल्कि आज के दौर में यह एक खतरनाक चलन बन गया है।पूरे प्रदेश के थानों में नजर डालें तो ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे,जहां रसूखदार लोग अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर निर्दोषों पर फर्जी मुकदमे लदवा देते हैं।

क्या शासन-प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोग कभी इस बात की गहराई से जांच करेंगे कि आखिर थाने के फोन रिकॉर्ड्स में किन ‘बड़े लोगों’ की दखलंदाजी रही है? यदि वास्तव में निष्पक्षता बची है, तो इस मामले के कॉल ट्रैक्स खंगाले जाने चाहिए ताकि यह सार्वजनिक हो सके कि कौन से सफेदपोश अधिकारी या नेता एक निर्दोष युवक को जेल भेजने की साजिश रच रहे हैं। क्या योगी सरकार की विजिलेंस टीम ऐसे मामलों की निगरानी करेगी जहां सत्ता की धौंस दिखाकर न्याय की हत्या की जा रही है?

अंततः सवाल उस व्यवस्था पर है जो पीड़ित को संरक्षण देने के बजाय दबंगों की ढाल बन जाती है। बासगाँव की इस घटना ने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या प्रशासन केवल कागजी फाइलों को भरने के लिए काम कर रहा है या वास्तव में जमीनी हकीकत देखकर कार्रवाई की जाएगी? जिस युवक के घर के बुजुर्ग लकवाग्रस्त होकर बिस्तर पर पड़े हों और पिता घर से दूर हों, उस पर इस तरह का संगठित हमला समाज के नैतिक पतन को दर्शाता है।

अब देखना यह है कि जौनपुर पुलिस किसी बाहरी दबाव में आकर एक और फर्जी मुकदमा दर्ज कर अपनी फाइल बंद कर देती है या फिर मुख्यमंत्री के निर्देशों का पालन करते हुए दूध का दूध और पानी का पानी करती है।क्या यह मामला भी रसूखदारों की फाइल तले दब जाएगा या फिर सच्चाई की जीत होगी?
















