49 साल बाद भी नहीं बचा रिश्वतखोर लेखपाल,300 रुपये घूस मामले में हाईकोर्ट ने बरकरार रखी एक साल की सजा
प्रयागराज।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 49 वर्ष पुराने रिश्वतखोरी के मामले में चकबंदी विभाग के तत्कालीन लेखपाल महेश चंद की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक वर्ष के कारावास की सजा को बरकरार रखा है।अदालत ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकल पीठ ने कहा कि यदि सतर्कता विभाग की ट्रैप कार्रवाई स्वतंत्र गवाहों और अन्य साक्ष्यों से प्रमाणित हो जाती है,तो मुख्य शिकायतकर्ता की गवाही न होने मात्र से भ्रष्टाचार का मामला कमजोर नहीं पड़ता।मामला 1 अप्रैल 1977 का है।ग्रामीण वीरेंद्र सिंह का चक आवंटन को लेकर विवाद चल रहा था।आरोप है कि तत्कालीन चकबंदी लेखपाल महेश चंद और कानूनगो चंद्र सेन ने विपक्षी की अपील खारिज कराने के बदले 400 रुपये की रिश्वत मांगी।

वीरेंद्र सिंह ने मौके पर कानूनगो को 100 रुपये दिए और बाद में कानपुर में सतर्कता विभाग से शिकायत कर दी।
विजिलेंस टीम ने 100-100 रुपये के तीन नोटों पर फिनोलफ्थेलिन पाउडर लगाकर जाल बिछाया।उसी दिन कानपुर के एक होटल में वीरेंद्र सिंह ने महेश चंद को 300 रुपये दिए।नोट जेब में रखते ही विजिलेंस टीम ने उसे रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया।हाथ और जेब सोडियम कार्बोनेट के घोल से धुलने पर उनका रंग बदल गया,जिससे रिश्वत लेने की पुष्टि हुई। पांचवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,कानपुर ने अक्टूबर 1985 में महेश चंद को दोषी ठहराते हुए एक वर्ष की सजा सुनाई थी।इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

सुनवाई के दौरान आरोपी ने तर्क दिया कि मुख्य शिकायतकर्ता की गवाही नहीं हुई और सार्वजनिक स्थान पर रिश्वत लेना संभव नहीं है।हालांकि,हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता की मानसिक स्थिति के कारण उसकी गवाही नहीं हो सकी,जबकि विजिलेंस अधिकारियों और स्वतंत्र गवाहों के बयान विश्वसनीय हैं।अदालत ने आरोपी की जमानत निरस्त करते हुए उसे चार सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया।
















