गौवंशों में लंपी रोग: जन जागरुकता विशेष
# पशु चिकित्सक डाक्टर आलोक सिंह पालीवाल संग तहलका टीम की विशेष रिपोर्ट
जौनपुर।
एखलाक खान
तहलका 24×7
भारतीय अर्थव्यवस्था में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले गौवंशों में लंपी रोग की भयावहता को लेकर सोमवार को तहलका ने अपने जन जागरुकता विशेष में पशु चिकित्सा में ख्यातिप्राप्त चिकित्सक आलोक सिंह पालीवाल संग खास वार्ता की। इस दौरान हुई वार्ता के सन्दर्भ में अपने पाठकों के बीच कुछ महत्वपूर्ण बातें साझा की जा रही है।बता दें कि हाल के वर्षों में एक ऐसी बीमारी ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी, जिसने न केवल गौवंशों की सेहत बल्कि आय पर भी असर डाला है।

वह बीमारी है लंपी स्किन डिज़ीज़ (Lumpy Skin Disease) इस बाबत डाक्टर पालीवाल ने गौवंशों में इसे एक संक्रामक बीमारी बताते हुए भारत के कई राज्यों में इसके कारण बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचना बताया। उन्होंने लोगों से इस रोग को समझने और रोकथाम के उपाय अपनाने पर अधिक बल दिया। संक्रमण के बाबत उन्होंने इस रोग के प्रसार में मच्छरों, मक्खियों, जूंए, किलनी और अन्य खून चूसने वाले कीटों की प्रमुख भूमिका कहा। संक्रमित पशु के शरीर से निकले स्राव या घाव का द्रव जब अन्य पशु के संपर्क में आता है तो रोग के फैलाव में तेजी आ जाती है।

साथ ही उन्होंने दूषित पानी, चारा और बाड़े की अस्वच्छता को भी उन्होंने प्रमुख कारण माना।संक्रमित पशुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन भी नए क्षेत्रों में फैलाव का कारण माना है।लंपी रोग के लक्षणों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े ही आसानी से इस रोग की पहचान हो जाती है। शुरुआत में पशु को तेज बुखार आता है और वह चारा-पानी कम करने लगता है। दूध में भी अचानक गिरावट हो जाती है। आंख और नाक से पानी या पस जैसा द्रव निकलने लगता है। धीरे-धीरे शरीर पर कठोर गोल गांठें बन जाती हैं, जिनसे बाद में घाव और मवाद निकल सकता है।

पशु लंगड़ाने लगता है, वजन घटने लगता है और कभी कभी गर्भवती गायों में गर्भपात की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। गंभीर स्थिति में पशु की मृत्यु भी हो सकती है। इस रोग का सबसे बड़ा असर उन्होंने दूध उत्पादन पर पड़ना बताया। उन्होंने कहा कि दूध उत्पादन में कमी आने से पशुपालकों की आय पर सीधा प्रहार होता है।मृत्युदर अधिक नहीं होती, लेकिन दूध, वजन और प्रजनन क्षमता घट जाने से आर्थिक नुकसान बहुत अधिक होता है।रोग के रोकथाम के सवाल पर उन्होंने बताया कि यह एक संक्रमित रोग है, इसलिए इसका कोई सीधा इलाज उपलब्ध नहीं है।

लेकिन टीकाकरण, स्वच्छता और लक्षण के नुसार उपचार से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। कहा गायों का समय पर टीकाकरण आवश्यक है। लंपी से बचाव के लिए लंपी विशेष वैक्सीन या गोट पॉक्स वैक्सीन का प्रयोग किया जाता है। उन्होंने पशुपालकों से मच्छरों और मक्खियों जैसे कीटों को खत्म करने के लिए बाड़े और आसपास कीटनाशक के छिड़काव करने की अपील की। साथ ही संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखने, उसके लिए अलग बर्तन और उपकरण का प्रयोग करने और बाड़े को साफ रखने पर बल दिया। कहा उनके बाड़े के आसपास किसी भी दशा में जल जमाव न होने दें।

संक्रमित पशु की देखभाल में बुखार कम करने के लिए ज्वरनाशक दवाएं, घाव पर एंटीसेप्टिक दवा, और बैक्टीरियल संक्रमण रोकने के लिए एंटीबायोटिक के प्रयोग पर बल दिया। साथ ही पशु को पौष्टिक आहार और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने को आवश्यक बताया। इसके अलावा कई घरेलू उपचार भी बताए, जो लंपी रोग से पीड़ित गौवंश की मदद कर सकते हैं। वायरस को खत्म नहीं करते, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और घाव भरने में मददगार होते हैं।विभिन्न घरेलू उपचार में डा. पालीवाल बताते हैं कि हल्दी में प्राकृतिक एंटीसेप्टिक गुण होते हैं।

हल्दी पाउडर को सरसों के तेल में मिलाकर घाव पर लगाने से संक्रमण कम होता है और घाव जल्दी भरता है। नीम की पत्तियों का काढ़ा पिलाने या घाव पर नीम का लेप लगाने से कीटाणु मरते हैं और घाव में कीड़े नहीं पड़ते। गिलोय का रस या उसका काढ़ा पशु को पिलाने से उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और वह जल्दी स्वस्थ होता है। एलोवेरा जेल को घाव पर लगाने से जलन और दर्द कम होता है और घाव जल्दी सूखता है। तुलसी का रस रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और शहद घाव पर लगाने से संक्रमण कम होता है। गुड़ और चना खिलाने से पशु की ऊर्जा बनी रहती है और कमजोरी कम होती है।

उक्त घरेलू नुस्खों के प्रयोग को दवा और चिकित्सीय उपचार के साथ भी करने से लाभकारी बताया। केवल घरेलू उपायों पर ही निर्भर रहने को उन्होंने खतरनाक बताया। इसलिए बीमार पशु को तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाने की बात कही।वार्ता के क्रम में उन्होंने इस रोग के बाबत सरकार और पशुपालकों दोनों की जवाबदेही तय करते हुए कहा कि समय पर टीकाकरण अभियान चलाए जाएं, संक्रमित पशुओं की सूचना पशु चिकित्सकों तक पहुंचे और लोगों को जागरुक किया जाए। यदि हम सब मिलकर प्रयास करें तो इस बीमारी को नियंत्रित कर सकते हैं।

कहा कि लंपी रोग पशुपालन के लिए गंभीर चुनौती है। यह गायों की सेहत और दुग्ध उत्पादन क्षमता को प्रभावित करता है। इसका कोई विशेष इलाज नहीं है, इसलिए रोकथाम ही सबसे कारगर उपाय है। समय पर टीकाकरण, बाड़े की स्वच्छता, कीट नियंत्रण और संक्रमित पशु की देखभाल से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। साथ ही हल्दी, नीम, गिलोय, एलोवेरा और तुलसी जैसे घरेलू उपाय भी सहायक सिद्ध होते हैं। यदि सरकार, पशु चिकित्सक व पशुपालक मिलकर प्रयास करें तो निश्चित ही इस बीमारी को रोका जा सकता है और पशुपालन को सुरक्षित और लाभकारी बनाया जा सकता है।







