सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: सज्जादानशीन होता है वक्फ का आध्यात्मिक प्रमुख, मुतवल्ली की भूमिका प्रशासनिक
नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सज्जादानशीन ही दरगाह का आध्यात्मिक प्रमुख होता है,जबकि मुतवल्ली की भूमिका केवल प्रशासन और प्रबंधन तक सीमित रहती है।अदालत ने दोनों पदों को अलग-अलग बताते हुए कहा कि इन्हें समान नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 2 अप्रैल को दिए गए विस्तृत फैसले में कहा कि सज्जादानशीन की नियुक्ति एक धार्मिक विषय है, जबकि मुतवल्ली का कार्य वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करना है।पीठ ने कहा कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 32(2)(g) के तहत नियुक्त सज्जादानशीन, जरूरत पड़ने पर मुतवल्ली का कार्य भी संभाल सकता है,लेकिन मुतवल्ली सज्जादानशीन की भूमिका नहीं निभा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सज्जादानशीन दरगाह का आध्यात्मिक प्रमुख होता है और उसके अधिकार धार्मिक परंपराओं से जुड़े होते हैं। वहीं मुतवल्ली का पद पूरी तरह प्रशासनिक और उसका काम संपत्ति व व्यवस्थाओं का संचालन करना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सज्जादानशीन का पद सामान्यतः वंशानुगत होता है।

“मोहम्मडन लॉ”की व्याख्या का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि संस्थापक को अपने उत्तराधिकारी को नामित करने का अधिकार होता है और यही परंपरा आगे भी चलती है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को मुतवल्ली पद से हटाया जाता है,तो उसके सज्जादानशीन के रुप में अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।अदालत ने कहा कि इस तरह के विवादों की सुनवाई का अधिकार सिविल न्यायालय को है।इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा यह कहना कि केवल वक्फ बोर्ड ही निर्णय ले सकता है,एक गंभीर त्रुटि थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत ने मामले की सुनवाई में कोई गलती नहीं की थी।इसलिए हाईकोर्ट का आदेश सही नहीं माना जा सकता।यह मामला कर्नाटक के रामनगर जिले स्थित हजरत अखिल शाह कादरी दरगाह के सज्जादानशीन पद से जुड़े अधिकारों को लेकर था।यह विवाद वर्ष 1988 से लंबित है।सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः हाईकोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया कि वह गुण-दोष के आधार पर फैसला करे और नौ महीने के भीतर निपटारा सुनिश्चित करे।


















