सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दी इच्छामृत्यु की मंजूरी,13 साल से बेड पर हैं हरीश राणा
नई दिल्ली।
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 32 साल के एक व्यक्ति को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी, जो एक दशक से अधिक समय से स्थायी वानस्पतिक अवस्था में है।जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि यह 2018 के कॉमन कॉज रूलिंग का पहला न्यायिक कार्यान्वयन है, जिसमें सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी गई है।

15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 32 साल के हरीश राणा के परिवार की उस अर्जी पर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसमें लगभग 13 साल से वानस्पतिक अवस्था में रहने वाले उसके लाइफ-सपोर्ट को हटाने की मांग की गई थी।वानस्पतिक अवस्था में व्यक्ति जागा हुआ दिखता है,जबकि कोमा में चेतना और जागृति दोनों ही नहीं होती।सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और राणा के परिवार की ओर से पेश वकील रश्मि नंदकुमार की दलीलें सुनीं।

13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के जजों ने राणा के माता-पिता और उसके छोटे भाई से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात की थी।परिवार ने जजों को बताया था कि वे नहीं चाहते कि उसे और तकलीफ हो।2013 में हरीश चौथी मंजिल से गिर गए थे और उनके सिर में चोट लग गई थी,जो पंजाब यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे।तब से वह पूरी तरह से बिस्तर पर हैं और एक आर्टिफिशियल सपोर्ट सिस्टम पर हैं।इतने वर्षों में यह दूसरी बार है जब उसके माता-पिता ने हरीश के लिए पैसिव यूथेनेशिया की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पर ध्यान दिया था जिसमें कहा गया था कि हरीश को होम केयर में रखा जाएगा,जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार मदद करेगी।डॉक्टर और एक फिजियोथेरेपिस्ट रेगुलर विजिट करेंगे।राणा सिर्फ सर्जरी से लगाए गए PEG ट्यूब के माध्यम से दिए जाने वाले क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन पर जिंदा हैं।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मरीज के माता-पिता और प्रथम और द्वितीय मेडिकल बोर्ड इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि मरीज को दिया जाने वाला CAN बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यह मरीज के भले के लिए नहीं है।

पीठ ने कहा कि हरीश राणा कभी एक जवान, होशियार लड़का था, जो अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद एक दुखद हादसे का शिकार हो गया था जिसने उसकी जिंदगी बदल दी। पीठ ने कहा कि उसके दिमाग की चोट की वजह से वह 100 प्रतिशत क्वाड्रिप्लेजिया (लकवा का एक रूप) के साथ परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PSV) में चला गया था और मेडिकल रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले 13 वर्षों में उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि आवेदक दर्द और तकलीफ में जिंदगी जी है और वह अपनी तकलीफ बताने की भी हालत में नहीं है।

पीठ ने कहा, हम बहुत सम्मान के साथ कहते हैं कि आवेदक के माता-पिता और भाई-बहन हमेशा उसके साथ खड़े रहे हैं।उन्होंने उसकी देखभाल करने की पूरी कोशिश की और पूरी लगन से ऐसा करते रहे।हम ऐसी मुश्किलों का सामना करते हुए उनके बेहिसाब प्यार, सब्र और दया के लिए दिल से शुक्रिया अदा कर सकते हैं। यह केस दिखाता है कि प्यार की मजबूती सबसे अधिक मजबूत होती है।जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि जिंदगी में सबसे बड़ी दुखद घटना मौत नहीं बल्कि अकेला छोड़ दिया जाना है और आवेदक के परिवार ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा,हर पल उसकी देखभाल की,उसे बचाया गया और उसे प्यार किया गया।















