


ध्यान रहे कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तमाम छोटी-छोटी पार्टियों को साथ लेकर नया जातीय समीकरण बनाया था। इसमें बीजेपी का परंपरागत वोट मिलाकर एक ऐसा मजबूत समीकरण बना कि पार्टी क्लीन स्वीप कर गई। लेकिन चुनाव के बाद जिस तरह से घटनाक्रम घटा है, उसने राज्य में भाजपा के पक्ष में बने जातीय समीकरणो में जो दरार डाली, वह अब खुलकर दिखने लगी है। भाजपा की पिछली चुनावी रणनीति यानी ‘स्माॅल पार्टी, बिग प्लानिंग’ पर इस बार समाजवादी पार्टी काम करती दिख रही है। इसका संकेत सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अगस्त में यह नारा देकर कि ‘नई हवा है, नई सपा है, बड़ों का हाथ, युवा का साथ’ दे दिया था। लेकिन तब इसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था। क्योंकि तब तक राज्य में भाजपा को अजेय ही माना जा रहा था।
इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा का किला बुरी तरह दरक गया है। आज की तारीख में संगठन, संसाधन और धनबल में वो सब पर भारी है। विकास के दावे, व्यापक हिंदू एकता और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर पूरा जोर दे रही है। उधर समाजवादी पार्टी की राह भी आसान नहीं है। कागज पर गणित किधर भी झुकता दिखाई दे, लेकिन बीजेपी आसानी से सत्ता हाथ से जाने देने वाली नहीं है क्योंकि यूपी में सत्ता खोने का संदेश पूरे देश और दुनिया में जाएगा। वैसे भी उसने गोवा, मणिपुर आदि राज्यों में दिखा दिया है कि चुनाव कोई भी जीते, सरकार उसी की बनती है। व्यावहारिक स्तर पर देखें तो पिछले विस चुनाव में भाजपा को 39.47 और सपा को 21.84 प्रतिशत वोट के साथ 47 सीटें मिली थीं। इसका मुख्य कारण ओबीसी के गैर यादव वोटों का भाजपा की तरफ झुकना और मुस्लिम वोटों का सपा सहित कई गैर भाजपा दलों में बंटना था। दूसरे, सत्ता में आने के लिए सपा को अपना वोट बैंक बढ़ाकर लगभग दोगुना करना होगा, जोकि आसान नहीं है। हो सकता है कि तमाम कोशिशो के बाद भी वो पौने दो सौ सीटों पर अटक जाए। जबकि भाजपा को अगर सौ सीटों का भी नुकसान हुआ तो भी वो सरकार बना सकती है।

बीजेपी के लिए चिंता की बात यह होनी चाहिए कि मौर्य के अलावाा वो विधायक भी पार्टी छोड़ने की राह पर हैं, जो अगड़ी जातियों के हैं। हो सकता है कि इन्हें इस बार टिकट न मिलने की भनक लग गई हो और इसीलिए वो दूसरे दलों में जाकर टिकट पक्का कर रहे हों, लेकिन चुनाव के वक्त में इस तरह जाना एक नकारात्मक हवा तो बनाता ही है हालांकि कुछ लोग भाजपा में आ भी रहे हैं और भगदड़ के पीछे राजनीतिक पूर्वानुमान हमेशा सही नहीं होता, जैसा कि हमने पश्चिम बंगाल में देखा।
बहरहाल, यूपी से भी पहले यह नकारात्मक हवा बीजेपी के लिए उत्तराखंड में बनने लगी थी। वहां भाजपा फिर चुनाव जीतने की उम्मीद में तीन सीएम बदल चुकी। फिर भी वहां एक मंत्री और एक विधायक कांग्रेस में चले गए हैं। केवल एक मंत्री को मनाकर रोका जा सका। गोवा में सत्तारूढ़ भाजपा के चार विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। मणिपुर में तो इस भगदड़ का बिगुल छह महीने पहले ही बज गया था, जब 6 भाजपा विधायकों ने इस्तीफे का ऐलान कर दिया था और बिरेन सिंह सरकार खतरे में आ गई थी लेकिन तब आला कमान ने हस्तक्षेप कर मामला संभाला और सरकार बचा ली थी। वैसे विधायक कांग्रेस के भी टूट रहे हैं लेकिन पंजाब के अलावा कांग्रेस कहीं भी पहली पंक्ति में नहीं है। असली मुद्दा यह राजनीतिक भगदड़ का ट्रेंड और यूपी में भाजपा विधायकों का पार्टी को टाटा करना, इस बात पर सवालिया निशान लगाता है कि क्या भाजपा की ओबीसी केन्द्रित राजनीति में कहीं न कहीं खोट है और नीयत व यथार्थ में फासला है। लिहाजा यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए हिंदुत्व की छतरी की सभी तीलियों को चाकचौबंद रख पाने की चुनौती भी है। तो क्या? यूपी में भी वो “खेला” शुरू हो गया है, जिसे अखिलेश यादव “खेला होबे” बता रहे हैं?