जौनपुर : कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम में किसानों को किया जागरूक

जौनपुर : कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम में किसानों को किया जागरूक

# कार्यक्रम में आए महिला व पुरुष किसानों को सम्मानित किया गया

केराकत।
विनोद कुमार
तहलका 24×7
                 स्थानीय क्षेत्र के अमिहित गांव स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र पर मंगलवार को नवनिर्मित सभागार में आत्मा योजनांतर्गत कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम में किसानों को खरीफ की फसल को वैज्ञानिक तरीके से करने के लिये जागरूक किया गया। कृषि मंत्रालय भारत सरकार द्वारा किसानों के हित में चलायी जाने वाली योजनाओं के बारे में बिंदुवार किसान मेले में आये किसानों को बताया गया।
पशुपालन, मत्स्य पालन करके किसानों की दशा व दिशा सुधारने के लिए वैज्ञानिक विधि और तकनीकी को उपयोग करने जैसी बातों पर चर्चा किया गया। मृदा के लगातार दोहन से उसमें उपस्थित पौधे की बढ़वार के लिये आवश्यक तत्त्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु तथा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिये हरी खाद एक उत्तम विकल्प है। बिना गले-सड़े हरे पौधे (दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नाइट्रोजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं। हरी खाद के उपयोग से न सिर्फ नाइट्रोजन भूमि में उपलब्ध होता है बल्कि मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में भी सुधार होता है। वातावरण तथा भूमि प्रदूषण की समस्या को समाप्त किया जा सकता है लागत घटने से किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, भूमि में सूक्ष्म तत्वों की आपूर्ति होती है साथ ही मृदा की उर्वरा शक्ति भी बेहतर हो जाती है।
दलहनी एवं गैर दलहनी फसलों को उनके वानस्पतिक वृद्धि काल में उपयुक्त समय पर मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए जुताई करके मिट्टी में अपघटन के लिए दबाना ही हरी खाद देना है। फसलें अपने जड़ ग्रन्थियों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु द्वारा वातावरण में नाइट्रोजन का दोहन कर मिट्टी में स्थिर करती है। आश्रित पौधे के उपयोग के बाद जो नाइट्रोजन मिट्टी में शेष रह जाती है, उसे आगामी फसल द्वारा उपयोग में लायी जाती है। इसके अतिरिक्त दलहनी फसलें अपने विशेष गुणों जैसे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने प्रोटीन की प्रचुर मात्रा के कारण पोषकीय चारा उपलब्ध कराने तथा मृदा क्षरण के अवरोधक के रूप में विशेष स्थान रखती है।
हरी खाद से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा से भौतिक दशा में सुधार होता है। नाइट्रोजन की वृद्धि हरी खाद के लिए प्रयोग की गई दलहनी फसलों की जड़ों में ग्रन्थियां होती है। जो नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं। ढैंचा को हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से प्रति हेक्टेयर 60 किग्रा० नाइट्रोजन की बचत होती है तथा मृदा के भौतिक रासायनिक तथा जैविक गुणों में वृद्धि होती है। सनई, ढैंचा,मूंग, उर्द, मोठ, ज्वार, लोबिया, बरसीम एवं सैंजी आदि फसलों की पैदावार कर भूमि की उर्वरा बढाई जा सकती है।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि ब्लाक प्रमुख सरोजा देवी ने किसान मेले में आये महिला और पुरुष किसानों को सम्मानित करते हुए प्रमाण दिया। इस अवसर पर संध्या सिंह, पटक सहायक शरद पटेल, डॉ वीके सिंह, केपी सिंह, मनीष शर्मा, खण्ड तकनीकी प्रबन्धक महीप श्रीवास्तव, डॉ दिनेश कुमार, वरुण कुमार, प्रदीप, पशु चिकित्साधिकारी डॉ महेंद्र सिंह, समेत तमाम महिला पुरुष किसान उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कृषि विज्ञान केन्द्र अध्यक्ष डॉ संजीत कुमार ने और संचालन डॉ विजय कुमार सिंह ने किया।

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