आइये जानते हैं बसंत पंचमी का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व
स्पेशल डेस्क।
राजकुमार अश्क
तहलका 24×7
सर्व प्रथम बसंत पंचमी एवं सरस्वती पूजा की तहलका 24×7 के सभी सुधी पाठकों को बहुत बहुत बधाई, बसंत आपके जीवन में खुशियाँ लेकर आये… हिंदू धर्म से जुड़ा हर त्योहार यदि आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है तो उसके अंदर वैज्ञानिक आधार भी समाहित होता है। इसी प्रकार बसंत पंचमी का अगर धार्मिक महत्व है तो इसका वैज्ञानिक महत्व भी कुछ कम नहीं है. हमारे मनीषियों ने कितनी वैज्ञानिकता के साथ हर त्योहार को धार्मिक बना दिया।

बसंत का अर्थ है सभी ऋतुओं का राजा यह माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाने वाला त्योहार है, इस समय प्रकृति अपनी पूर्ण सौंदर्य पर होती है हर तरफ़ फसलें लहलहाती है जिसे देखकर किसान का मन रूपी मयूर नाचने लगता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में स्वंय कहा है कि ऋतुओं में मैं बसंत हूँ. यह वह समय होता है जब प्रकृति अपने पंच तत्व को पूरी तरह निखारने के लिए तैयार होती है।
प्रकृति में चारों तरफ़ पीला रंग बिखर जाता है, हिंदू धर्म में पीले रंग को शुभ मान कर इसको अनेकों रूपों में पूजने पहनने खाने आदि का भी वर्णन हमारे धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी पीला वस्त्र धारण करते थे इसी कारण उन्हें पीताम्बर धारी भी कहा जाता है।

# बसंत पंचमी पर पीले रंग का महत्व
वैसे तो हर रंग की अपनी एक विशेष खासियत होती है मगर हिंदू धर्म में पीले रंग को महत्वपूर्ण स्थान देते हुए इसे शुभ माना जाता है। पीला रंग एक तरफ़ अगर शुद्धता का प्रतीक माना जाता है तो दूसरी तरफ़ यह सात्विकता, सादगी, निर्मलता को भी दर्शाता है. फेंगशुई के अनुसार यह रंग आत्मिक रंग है, पीला वस्त्र ऊष्मा का वाहक भी माना जाता है जिसे धारण करने से सूर्य की किरणें सीधे हमारे मष्तिष्क पर असर करती है और हमें संतुलन, एकाग्रता, और तारतम्य स्थापित करने में सहायता मिलती है।

# बसंत पंचमी का पौराणिक महत्व
जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना कर दी तब भी उन्हें इसमें नीरसता का आभास होता रहा, हर तरफ एक शून्य सा दिखाई देता देता था। सभी चर अचर प्राणी नीरसता के भाव से घिरे हुए महसूस हो रहें थे तब ब्रह्मा जी ने सृष्टि के पालन कर्ता भगवान विष्णु से इस नीरसता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल की कुछ बूंदे इस पृथ्वी पर छिड़की जिससे पृथ्वी पर एक अद्भुत चार भुजाओं वाली शक्ति प्रकट हुई जिसके एक हाथ में पुस्तक, एक में वीणा, एक में पुष्प तथा एक हाथ में माला थी।
ब्रहमा जी ने उस देवी से अपनी वीणा को बजाने की प्रार्थना की, उस देवी ने जैसे ही अपनी वीणा के तारों को छेड़ा उसकी झंकार से सात मधुर स्वर लहरी निकली जिसे सरगम नाम दिया गया। इसी झंकार से प्रकृति में व्याप्त सारे चर अचर जीव जो चेतना शून्य थे सभी चैतन्य अवस्था में आकर नृत्य करने लगे, ऋषि मुनियों ने वेद मंत्रों से सारे वातावरण को भक्ति मय बना दिया। इसी कारण इस दिन माता सरस्वती की पूजा होती है, और माताएँ अपने बच्चों को अक्षर ज्ञान करवाना भी इस दिन शुभ मानती हैं।



















