स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी को काव्यांजलि के माध्यम से श्रद्धांजलि…
स्वर साम्राज्ञी रही धरा की
आज स्मृति शेष हो गई..
विलुप्त हो गया स्वर का तारा
शून्य में विलीन हो गया।
सदियों से झंकृत वीणा का
सरगम उदासीन हो गया।।
दुखी दिशाएं, निर्जन अंबर
पवन भी गमगीन हो गया।
मद्धिम हुई उषा की लाली
सूर्य भी आज मलीन हो गया।।
नभ में तारे तितर-बितर हैं
सांझ आज निस्तेज हो गई।
सिमट गई चांदनी तिमिर में
निशा भी अधिशेष हो गई।।
नीरवता छाई है नभ में
जड़-चेतन गतिहीन हो गए।
वाणी मन्द, उन्निदी आंखें
मुखमंडल कांति विहीन हो गए।।
कंठ कोकिला, रत्न भारत की
चिरनिंद्रा में लीन हो गई।
स्वर साम्राज्ञी रही धरा की
आज स्मृति शेष हो गई।।
अतुलनीय सुर-ताल की देवी
शास्वत शांत खामोश हो गई।
मुस्कान सदा जिसके चेहरे पर
वही आज अवशेष हो गई।।
गीत सदा गूंजेंगे नभ में
जिनको तुमने आवाज दिया।
सुर लय ताल के अद्भुत संगम से
नवजीवन का राग दिया।।
नतमस्तक है राष्ट्र तुम्हारे
देशभक्ति के गान से।
राष्ट्र दुखी है आज तुम्हारे
असमय अवसान से।।
















