होली पर्व पर अब नहीं सुनाई देते फाग के गीत
# बदलते समय में फीकी पड़ती लोक परंपरा,फाल्गुन की रातें और चौपाल की रौनक
खेतासराय, जौनपुर।
डॉ. सुरेश कुमार
तहलका 24×7
होली का नाम लेते ही कभी गांवों की चौपाल,कच्ची गलियों और आंगनों से उठती ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार कानों में गूंज उठती थी। फाल्गुन का महीना लगते ही वातावरण में एक विशेष उल्लास भर जाता था।रात ढलते ही पुरुषों की टोलियां और महिलाओं के अलग समूह पारंपरिक फाग गाने के लिए एकत्रित होते थे।गीतों में हास्य,व्यंग्य,श्रृंगार और भक्ति का अद्भुत संगम होता था।आज वही होली बदलते सामाजिक परिवेश में नए रुप में दिखाई दे रही है।

रंगों की चमक बरकरार है,पर फाग के गीतों की वह आत्मीय गूंज अब विरल होती जा रही है।भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि लोकजीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति रही है।इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ी है,जो सत्य की विजय का प्रतीक मानी जाती है।
वहीं ब्रज क्षेत्र में राधा और कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी फाग परम्परा ने इस पर्व को रस और रंग का अनूठा आयाम दिया।

फाग गीतों में कृष्ण-राधा के संवाद, गोपियों की नोकझोंक, लोकजीवन की सहज अनुभूतियां बड़े जीवंत रुप में अभिव्यक्त होती थीं। ब्रज के मथुरा, वृंदावन और आस-पास के क्षेत्रों में होली का उत्सव आज भी विश्वविख्यात है। यहां लट्ठमार होली, फूलों की होली और पारम्परिक फाग गायन की झलक मिलती है, किंतु स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जैसी सामूहिकता और स्वाभाविकता अब कम होती जा रही है।

बड़े आयोजनों में मंच और साउंड सिस्टम की प्रधानता ने पारम्परिक चौपाल संस्कृति को पीछे कर दिया है।ग्रामीण अंचलों में भी स्थिति कमोबेश यही है।पहले होली से एक सप्ताह पूर्व ही गांव में फाग मंडलियों का अभ्यास आरंभ हो जाता था।बुजुर्ग लोक गायक नई पीढ़ी को गीत सिखाते थे।ढोलक,झांझ और हारमोनियम के साथ पूरी रात फाग गाए जाते थे।इन गीतों में सामाजिक व्यंग्य भी होता था,गांव के मुखिया से लेकर नव विवाहित दाम्पत्य तक,सभी पर हास्यपूर्ण टिप्पड़ियां की जाती थीं,जिन्हें लोग सहजता से स्वीकार करते थे।

यह लोकसंवाद का सशक्त माध्यम था।अब इसकी जगह डीजे और फिल्मी गीतों ने ले ली है।तेज ध्वनि और आधुनिक धुनों के बीच लोक संगीत की कोमल लय दबती जा रही है।असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विमल कुमार यादव ने इस परिवर्तन के पीछे कई सामाजिक कारण बताया है,उन्होंने बताया कि तेजी से बढ़ता शहरीकरण, गांवों से युवाओं का पलायन और संयुक्त परिवारों का विघटन, इन सबने लोकपरंपराओं की निरंतरता को प्रभावित किया है।आज के युवा रोजगार और शिक्षा के कारण शहरों में बस रहे हैं।

वहां सामूहिक सांस्कृतिक अभ्यास के अवसर सीमित हैं। डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया ने भी पारम्परिक मेल-मिलाप की संस्कृति को प्रभावित किया है।होली के अवसर पर अब लोग एक-दूसरे के घर जाकर फाग गाने की बजाय मोबाइल पर शुभकामना संदेश भेजकर औपचारिकता निभा लेते हैं।लोक कलाकारों की स्थिति भी चिंताजनक है।अनेक पारंपरिक फाग गायक बताते हैं कि पहले उन्हें गांव-गांव से निमंत्रण मिलता था और उनका सम्मान किया जाता था। अब कार्यक्रमों में डीजे और ऑर्केस्ट्रा को प्राथमिकता मिलती है।

आर्थिक प्रोत्साहन के अभाव में नई पीढ़ी लोकगायन को अपनाने से हिचक रही है।यदि यह क्रम जारी रहा तो आने वाले वर्षों में फाग गीत केवल पुस्तकों और अभिलेखों तक सीमित रह सकते हैं।हालांकि सकारात्मक पहल भी सामने आ रही हैं।कुछ सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन पारम्परिक फाग प्रतियोगिताओं और लोक उत्सवों का आयोजन कर रहे हैं।विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोकसंगीत कार्यशालाओं की शुरुआत की जा रही है।आकाशवाणी और अन्य प्रसारण माध्यमों पर फाग विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं।

सोशल मीडिया का उपयोग भी अब संरक्षण के साधन के रुप में किया जा रहा है,युवा कलाकार पारम्परिक फाग रिकॉर्ड कर डिजिटल मंचों पर साझा कर रहे हैं, जिससे इन गीतों को नया श्रोता वर्ग मिल रहा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।डॉ. विमल कुमार यादव का मानना है कि आधुनिकता को पूर्णतः अस्वीकार करना समाधान नहीं है।आवश्यकता सन्तुलन की है।यदि होली के उत्सव में कुछ समय पारम्परिक फाग गायन के लिए सुरक्षित रखा जाए,ग्राम पंचायत और स्थानीय संस्थाएं लोक कलाकारों को मंच दें,और नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराया जाए, तो यह परंपरा पुनर्जीवित हो सकती है।

होली का वास्तविक सौंदर्य केवल रंगों की चटख में नहीं, बल्कि उन स्वरों में है जो समुदाय को एक सूत्र में बांधते हैं।फाग के गीतों में जो अपनापन,सहजता और लोकजीवन की आत्मा बसती है,वही इस पर्व की पहचान है।यदि यह स्वर खो गया,तो होली का सांस्कृतिक आयाम अधूरा हो जाएगा।इसलिए समय की मांग है कि हम अपने लोकसंगीत और परंपराओं को सहेजने की सामूहिक जिम्मेदारी निभाएं,ताकि आने वाली पीढ़ियां भी फाल्गुन की रातों में फाग की मधुर गूंज सुन सकें।







