दूध कम नहीं,गलत समय पर दुहने से घट रहा उत्पादन
# डा.आलोक सिंह पालीवाल ने बताया मिल्किंग टाइमिंग का वैज्ञानिक सच
शाहगंज,जौनपुर।
एखलाक खान
तहलका 24×7
पूर्वांचल के कई जिलों में दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन कम होने की समस्या आम होती जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण पशु नहीं, बल्कि दुहने का गलत समय (मिल्किंग टाइमिंग) है। अधिकांश पशुपालक अपनी सुविधा के अनुसार कभी जल्दी तो कभी देर से दूध दुहते हैं,जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।

पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. आलोक सिंह पालीवाल बताते हैं कि दुधारू पशुओं में दूध बनने और निकलने की प्रक्रिया हार्मोन पर निर्भर करती है,खासकर ऑक्सीटोसिन हार्मोन पर।यदि पशु को रोज एक ही समय पर दुहा जाए,तो यह हार्मोन उसी समय सक्रिय होकर दूध को आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है।समय में बदलाव होने पर यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो जाती है और पशु पूरी क्षमता से दूध नहीं दे पाता।आमतौर पर 12-12 घंटे के अंतराल पर दूध दुहना सबसे उपयुक्त माना जाता है।

जैसे सुबह 6 बजे दुहा गया है,तो शाम को भी लगभग उसी समय दुहना चाहिए।समय में देरी होने पर थनों में दबाव बढ़ता है,जिससे दूध बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और मास्टाइटिस जैसे संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है।पूर्वांचल के गांवों में यह भी देखा जाता है कि पशुपालक सुबह तो समय से दुह लेते हैं,लेकिन शाम को खेत या अन्य कार्यों के कारण देर कर देते हैं।यह असंतुलन धीरे-धीरे दूध उत्पादन को कम कर देता है, जबकि किसान वास्तविक कारण समझ नहीं पाते।

विशेषज्ञों के अनुसार सही मिल्किंग रूटीन के लिए एक निश्चित समय तय करना और उसका नियमित पालन करना जरूरी है।दुहने से पहले पशु को शांत रखना, थोड़ा चारा देना और थनों की साफ सफाई करना भी आवश्यक है,जिससे हार्मोन का स्राव बेहतर होता है और दूध पूरी तरह निकलता है।साथ ही दुहते समय जल्दबाजी से बचना चाहिए और पूरा दूध निकालना जरूरी है।थनों में दूध बचने से अगली बार उत्पादन प्रभावित होता है।एक ही व्यक्ति द्वारा दुहना भी बेहतर माना जाता है,क्योंकि पशु उसके साथ सहज महसूस करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि दुधारू पशु जीवित प्राणी हैं और उनका शरीर एक निश्चित जैविक चक्र पर कार्य करता है।यदि पशुपालक इस चक्र को समझकर काम करें,तो बिना अतिरिक्त खर्च के भी 10 से 20 प्रतिशत तक दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।आज के समय में पशुपालन एक व्यवसाय का रूप ले चुका है।ऐसे में वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना जरुरी है।पूर्वांचल के युवाओं के लिए यह एक अच्छा अवसर है कि वे आधुनिक जानकारी का उपयोग कर अपने पशुपालन को अधिक लाभदायक बनाएं।


















