गिरफ्तारी में कानून तोड़ा तो नहीं चलेगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो मामलों में हिरासत अवैध ठहराई, तत्काल रिहाई के आदेश
प्रयागराज।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए दो अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार व्यक्तियों की हिरासत और रिमांड को अवैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि गिरफ्तारी के दौरान निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न किया जाना संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है।कोर्ट ने दोनों मामलों में संबंधित याचियों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया,हालांकि सरकार और जांच एजेंसियों को कानून के अनुरुप नए सिरे से कार्रवाई करने की छूट भी दी है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये महत्वपूर्ण आदेश पारित किए।पहले मामले में याची कपिल चुघ को गुजरात पुलिस ने 20 अप्रैल को केंद्रीय जीएसटी अधिनियम की धारा 132(1) एवं 132(5) के तहत गिरफ्तार किया था।बाद में उसे बी-वारंट पर गौतमबुद्ध नगर लाया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।हाईकोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के दौरान न तो याची को गिरफ्तारी मेमो दिया गया और न ही उसके परिजनों या अधिवक्ता को इसकी सूचना दी गई।

अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के कारण भी न लिखित रुप में बताए गए और न ही मौखिक रुप से जानकारी दी गई।यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है। खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि गुजरात से उत्तर प्रदेश लाते समय किसी मजिस्ट्रेट से ट्रांजिट रिमांड नहीं लिया गया।अदालत ने कहा कि जब केंद्रीय जीएसटी अधिनियम के तहत पहले से कार्रवाई चल रही थी,तब उसी मामले में पुलिस द्वारा भारतीय न्याय संहिता के तहत अलग मुकदमा दर्ज करना उचित नहीं माना जा सकता।

राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि याची कानून का पालन नहीं करता और रिहा होने पर फरार हो सकता है,लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।अदालत ने गिरफ्तारी,हिरासत और रिमांड को अवैध एवं असंवैधानिक घोषित करते हुए कपिल चुघ की तत्काल रिहाई का आदेश दिया।वहीं दूसरे मामले में केंद्रीय जीएसटी आयुक्त,मेरठ द्वारा सेंट्रल एक्साइज एक्ट,1944 के तहत गिरफ्तार किए गए नितिन राजेश को राहत मिली।अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी संबंधी दस्तावेजों में गंभीर अनियमितताएं थीं।

कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी दस्तावेजों पर विभागीय सर्कुलर के अनुसार अनिवार्य डिजिटल पहचान संख्या अंकित नहीं थी।जो संख्या दर्ज थी,वह हाथ से लिखी गई थी,जो नियमों के विपरीत है।इसके अलावा गिरफ्तारी के आधार और कारणों वाले दस्तावेजों पर सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर भी नहीं थे। अदालत ने यह भी पाया कि याची पहले से जेल में था, इस तथ्य को गिरफ्तारी के कारणों में छिपाया गया। बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी नहीं किया गया और परिजनों को गिरफ्तारी की सूचना देने संबंधी प्रावधानों का भी पालन नहीं हुआ।

हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में रिमांड आदेशों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि संबंधित मजिस्ट्रेटों ने न्यायिक विवेक का पर्याप्त उपयोग किए बिना यांत्रिक ढंग से रिमांड मंजूर कर दिया।अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने से पहले कानून द्वारा निर्धारित प्रत्येक प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है।

हालांकि हाईकोर्ट ने दोनों याचियों की गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध करार दिया,लेकिन साथ ही संबंधित एजेंसियों और सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि यदि आवश्यक हो तो वे कानूनन निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए नए सिरे से कार्रवाई कर सकती हैं।हाईकोर्ट के इन आदेशों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधि के शासन के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अपराध की गंभीरता चाहे जो भी हो,गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती। कानून के दायरे में रहकर ही जांच एजेंसियों को कार्रवाई करनी होगी।


















