यूपी हुआ भगवामय, कानून व्यवस्था एंव लाभार्थी फैक्टर बने जीत का द्योतक

यूपी हुआ भगवामय, कानून व्यवस्था एंव लाभार्थी फैक्टर बने जीत का द्योतक

# यूपी विधानसभा चुनाव की समीक्षा रवि शंकर वर्मा के नजरिए से…

लखनऊ।
स्पेशल डेस्क
तहलका 24×7
                करीब दो महीने पहले जब पश्चिम से चुनाव की शुरुआत हुई, तो सर्द हो रहे मौसम में चुनावी तस्वीर पर ओस की बूंदें जमी हुई थीं। बहुत कुछ धुंधला और उलझा हुआ सा था। 2017 के चुनाव में पश्चिम से भाजपा के पक्ष में चली हवा ने पूरे प्रदेश में तूफान जैसा रूप ले लिया था। पर, इस बार किसान आंदोलन से उपजे हालात और समाजवादी पार्टी-रालोद गठबंधन ने भाजपा की राह में कांटे बिछाए हुए थे।

बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, आवारा पशुओं से फसलों के नुकसान जैसे मुद्दे हवा में तैर रहे थे। पिछड़ी जातियों के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी और ओमप्रकाश राजभर सहित करीब दर्जन भर विधायकों ने भाजपा से पाला बदलकर जातीय समीकरणों को उलझा दिया था। मुस्लिमों और यादव वर्ग के एकतरफा समर्थन से सपा का एक बड़ा वोट बैंक तैयार हो गया था। इससे भाजपा के खेमे में चिंता बढ़ गई  थी। पिछले चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत में इन नेताओं और उनकी जातियों के वोटों की अहम भूमिका   थी। चुनाव के ऐन वक्त पहले लगे इन झटकों से भाजपा एकबारगी बैकफुट पर भी दिख रही थी।

इन हालातों में चुनाव अभियान शुरू करते समय भाजपा के सामने तमाम मुश्किलें थीं। यही कारण था कि चुनाव घोषणा पत्र जारी होने में समय लगा। दोनों पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र मतदान से ठीक एक दिन पहले जारी हुए। वैसे बेरोजगारी दूर करने और बिजली सहित तमाम मुफ्त कल्याणकारी योजनाओं से भरे इन चुनावी घोषणा पत्रों के कुछ खास मायने नहीं रह गए थे, क्योंकि देरी होते देख दोनों पार्टियां टुकड़ों में घोषणाएं पहले से ही करने लगी थीं। यह माना जा रहा था कि अखिलेश यादव ने पुरानी पेंशन बहाली का दांव चल कर कर्मचारियों के एक बड़े खेमे को अपने पाले में कर लिया है। बसपा और कांग्रेस के कमजोर पड़ने से विपक्ष के वोटों के बंटवारे से मिलने वाले फायदे की उम्मीदें भी खत्म हो गई थीं। ऐसे में यह तय माना जाने लगा था कि योगी सरकार के कामकाज को अब कसौटी पर आम जनता परखेगी और यही भाजपा की जीत का आधार बन सकता है।

स्पष्ट है कि मतदाताओं ने भाजपा सरकार के कामकाज पर भरोसा जताया और मुश्किल हालात में भी वापसी करके योगी ने इतिहास रच दिया है। यूपी में किसी भी मुख्यमंत्री ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं की है। जीत के इस गणित में यूपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू भी बेहद असरदार रहा। लेकिन इस वापसी के लिए बने समीकरणों पर गौर करना जरूरी है।
चुनाव की शुरुआत में मंडल और कमंडल के मुद्दे प्रभावी तो थे, लेकिन उनकी धार में इतनी तीव्रता नहीं रह गई थी कि सिर्फ इन मुद्दों के सहारे चुनावी वैतरणी पार की जा सके। लेकिन भाजपा के पक्ष में कई ऐसे अहम मुद्दे थे जिससे आम वोटर कहीं न कहीं प्रभावित हो रहा था। इन सभी मुद्दों को जोड़कर आमजन में पांच साल के कामकाज के प्रति विश्वास की भावना लाना बेहद जरूरी था।

अपराधग्रस्त राज्य का दंश झेलने वाले यूपी के आम लोगों के लिए पहला बड़ा मुद्दा सुरक्षा और कानून-व्यवस्था में सुधार का रहा, जिसने चुनाव को खासा प्रभावित किया। विशेषकर महिला सुरक्षा की स्थिति में आए बड़े बदलाव ने राज्य में अखिलेश यादव के उठाए गए मुद्दों की काट के तौर पर लगभग पूरे प्रदेश में भाजपा के लिए संजीवनी की तरह काम किया। यह एक ऐसा मुद्दा था जिसे महज दावा करके सही साबित नहीं किया जा सकता है। आम मतदाताओं ने सुरक्षा के हालात सुधरने का अहसास भी किया और खुल कर यह बोलता रहा कि योगी के राज में बहू-बेटियां सुरक्षित हैं। प्रदेश के बड़े-बड़े माफिया की अवैध संपत्तियों को बुलडोजर से ढहाना हर वर्ग को रास आया।

रात में पूरे राज्य में सफर के दौरान सुरक्षा का भाव आम लोगों में आना, लूटपाट, चोरी-डकैती की घटनाओं पर नियंत्रण और गुंडाराज का खात्मा एक ऐसा मुद्दा बना जिस पर योगी सरकार को खुले मन से सबने पूरे राज्य में सराहा। बड़ी संख्या में मतदाता सिर्फ इस एक मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में वोट देते नजर आए। उनका साफ कहना था कि महंगाई व अन्य समस्याएं तो झेल लेंगे, लेकिन चोरी, लूटपाट, गुंडागर्दी, युवतियों से छेड़छाड़ से उन्हें काफी हद तक मुक्ति मिली है और वे सुरक्षा के साथ चैन से रह पा रहे हैं। यह उनके लिए एक बड़ी राहत है। माफिया पर हुई सख्त कार्रवाई की वजह से पूरे चुनाव के दौरान बाबा का बुलडोजर और बदमाशों को ठोकने की नीति भी खासी चर्चा का विषय बनी रही।

दूसरा बड़ा मुद्दा था विकास, जिसका श्रेय योगी सरकार को मिला। अब सवाल यह उठता है कि अपनी सरकार में विकास करने के दावे तो अखिलेश यादव ने भी किए थे। पर, अखिलेश और योगी के विकास के दावे में एक फर्क लोगों को साफ तौर पर दिखता था। अखिलेश का विकास सिर्फ लखनऊ के रिवर फ्रंट और सैफई तक सीमित थे। इसमें भी बड़े भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। करीब सवा आठ सौ करोड़ से अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के लिए बना जेपीएनआईसी भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कभी शुरू ही नहीं हो पाया। लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे के लिए भी यह आरोप लगे कि रास्ते में पड़ने वाले शहरों-कस्बों से दूर निकले इस एक्सप्रेस-वे को सैफई की वजह से बनाया गया।

दूसरी ओर भाजपा सरकार में राज्य के समग्र विकास पर जोर दिया गया। शहरों, कस्बों व गांवों में सड़कों की हालत में सुधार के साथ ही पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, गंगा एक्सप्रेस-वे, मेरठ-दिल्ली एक्सप्रेस-वे के काम को तेजी से बढ़ाया गया। साथ ही पानी संकट से जूझने वाले बुंदेलखंड के एक बड़े इलाके में पेयजल सप्लाई पर अच्छा काम किया गया। लखनऊ-कानपुर-बुंदेलखंड के बीच डिफेंस कॉरिडोर विकसित करने की योजना यद्यपि पूरी तरह से परवान नहीं चढ़ सकी, लेकिन इसकी शुरुआत हो गई है।

कई शहरों में घरेलू हवाई अड्डों के साथ अयोध्या, कुशीनगर सहित पांच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की भी शुरुआत हुई है। मुख्यमंत्री के अपने क्षेत्र गोरखपुर और प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के विकास और विश्वनाथ कॉरिडोर से भी पूरे पूर्वांचल की तस्वीर बदलने लगी है। समग्रता में हुए इस विकास से आम लोगों में यह साफ संदेश गया कि योगी सरकार पूरे राज्य के विकास पर जोर दे रही है। चुनाव से पहले मतदाताओं से बातचीत के दौरान साफ दिखा। आम लोग विकास के नाम पर भाजपा को वोट देते दिखे।

कोविड काल में शुरू हुई गरीबों को मुफ्त अनाज की सुविधा ऐसा तीसरा बड़ा मुद्दा था जिसने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। इस योजना ने विशेषकर महिलाओं को भाजपा के पक्ष में खड़ा कर दिया। किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री आवास सहित तमाम योजनाओं का पैसा लाभार्थियों के खाते में सीधे पहुंचने के कारण जाति, वर्ग विशेष, बेरोजगारी और आवारा पशुओं से नाराजगी वाले वोटों के जरिये भाजपा को घेरने की कोशिशों पर एक तरह से पानी फेर दिया।

महीने में दो बार मुफ्त अनाज की योजना ने बढ़ती महंगाई से बने विरोध के माहौल को भी काफी हद तक शांत करने के साथ एक ऐसा वोट बैंक तैयार कर दिया जो बेहद मुखर होने के साथ भाजपा के साथ जाना ही पसंद कर रहा था। कोविड की दूसरी लहर के दौरान गंगा में लाशें मिलने से सरकार आलोचनाओं में घिरी थी, लेकिन बाद में स्वयं मुख्यमंत्री के कोरोना पीड़ित मरीजों के घर तक जाकर कोविड नियंत्रण के उपायों पर गंभीरता से पहल करने को काफी सराहा गया। सपा सरकार की तरह सिर्फ खास इलाकों में बिजली आपूर्ति के भेदभावपूर्ण नीति के बजाय पूरे राज्य में एक समान और बेहतर बिजली आपूर्ति की व्यवस्था की गई इससे भी चुनाव में मदद मिली।

इसके साथ ही हिंदुत्व की कुंद हो रही धार को फिर से तेज करने के लिए भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे को भी खुलकर उठाया जिससे कई जगहों पर वोटों का ध्रुवीकरण होता दिखा। विशेषकर पश्चिम में जहां मुस्लिम और जाटों का मजबूत गठबंधन होते देख बाकी बिरादरियों को एकजुट करने के लिए योगी आदित्यनाथ ने बेहद तीखे हमलों के साथ वोटों का ध्रुवीकरण करा कर सफलता पाई।

इस बार के चुनावों में कई मिथक भी टूटे हैं। यह माना जाता है कि जो नोएडा का दौरा करेगा उसकी यूपी की सत्ता में कुर्सी चली जाएगी। लेकिन योगी न सिर्फ पूरे पांच साल निरंतर नोएडा के दौरे करते रहे, बल्कि चुनाव में वापसी भी कर दी है। मायावती और अखिलेश यादव हमेशा की तरह नोएडा के दौरों से दूर ही रहे। इन मिथकों को एक योगी ने ही तोड़ा। इससे शायद अंधविश्वास में घिरे रहने वाले भारतीय समाज को एक सकारात्मक दिशा मिलेगी।

भाजपा के लिए सुनियोजित तरीके और मजबूत संगठन के जरिए चुनाव लड़ने की वजह से भी समाजवादी पार्टी कमजोर पड़ी। पहले दो चरणों में अपेक्षित सफलता न मिलने के अंदेशे को देख भाजपा की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर निचले स्तर तक की पूरी मशीनरी चुनाव मैदान में तूफानी ढंग से कूद पड़ी। आवारा पशुओं की वजह से नुकसान को होते देख स्वयं प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में 10 मार्च के बाद इसका हल कर देने की घोषणा कर नाराजगी दूर करने का प्रयास किया। मुफ्त अनाज की योजना के लिए आम लोगों की संवेदनाएं जगाने के लिए उन्होंने नमकहरामी नहीं करने का जिक्र इशारों में किया।

बाद में यह भी कहा कि वे लोगों से नमकहलाली करेंगे। अंतिम दो चरणों में तो योगी और मोदी ने पूरी ताकत झोंक दी और हर तरह से मतदाताओं को अपने पक्ष में मोड़ने के जतन किए। जिसका असर भी साफ तौर पर दिखा। दूसरी ओर पहले दो चरणों के बाद ही अखिलेश का चुनाव प्रचार अभियान बिखरने लगा था। तीसरे चरण के प्रचार में उन्होंने करहल में मुलायम सिंह और शिवपाल सिंह यादव को साथ में लिया और प्रयागराज में डिंपल यादव को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन उसका विशेष असर नहीं हो सका।

अखिलेश की मुश्किलें यह रही कि मुस्लिम और यादव वोटों के अतिरिक्त वे सिर्फ जाटों को साथ जोड़ पाए। जाटों का प्रभाव पश्चिम की कुछ सीटों तक ही सीमित है, उसका भी लाभ रालोद को ज्यादा मिला। शेष प्रदेश में उनके पक्ष में एकमुश्त वोट किसी जाति के नहीं पड़ पाए। स्वामी प्रसाद मौर्या, ओमप्रकाश राजभर, दारा सिंह चौहान व धर्म सिंह सैनी जैसे जातीय समीकरणों से जुड़े नेताओं को उन्होंने अपने साथ जोड़ा, लेकिन ये नेता अपनी ही सीट बचाने में फंस कर रह गए और अखिलेश का यह प्रयोग भी विफल हो गया। इन जातियों के लोगों ने बार-बार पाला बदलने के अपने नेताओं के बजाय योगी सरकार के कामकाज पर ज्यादा भरोसा किया। इससे वोट प्रतिशत की लड़ाई में अखिलेश पिछड़ गए। नतीजतन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।

लेकिन चुनाव नतीजों ने काफी कुछ साफ संकेत या यूं कह लीजिए कि चेतावनी हर राजनीतिक दल को दी है कि यदि उनकी प्राथमिकता में जनहित नहीं है, तो उनकी नैया पार होना अब मुश्किल है। सिर्फ लोक लुभावन वादों और वर्गों-जातियों में समाज को बांटकर जीतने के ख्वाब लंबे समय तक टिकने वाले नहीं हैं। आम जनता की कसौटी पर खरा उतरने से पहले यह समझना जरूरी है कि असल में उनकी अपेक्षा क्या है, राज्य की प्रगति में क्या आड़े आ रहा है। इसे समझना अपरिहार्य है। इसे शायद योगी सरकार ने बेहतर ढंग से समझा। कानून-व्यवस्था, कोविड की वजह से मुश्किल में फंसे लोगों को मुफ्त अनाज और विकास के मोर्चे पर जमीनी स्तर पर काम करके एक बेहतर गवर्नेंस का अहसास कराया। लेकिन भाजपा की सरकार को यह भी समझना होगा कि जीत हासिल होने के साथ ही उसकी जमीन भी खिसकी है।

उनकी सीटें यदि पिछली बार से कम हुई हैं तो यह साफ संदेश भी है कि कहीं न कहीं वोटर उनसे कुछ मुद्दों पर नाराज भी है। यह भी याद रखना होगा कि बेरोजगारों का सवाल कोई छोटा सवाल नहीं है। प्रयागराज में युवाओं पर लाठियां बरसीं तो क्यों, इस पर भी गंभीरता से चिंतन कर समाधान निकालना होगा। भाजपा सरकार को इन कमियों को दूर करना योगी सरकार के लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। दो साल बाद ही लोकसभा चुनाव होने हैं और यूपी की योगी सरकार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विराट सत्ता को बचाने के लिए अपने कामकाज की अग्निपरीक्षा देनी होगी।

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