हमारे राष्ट्र ने हमेशा निभाई है एक विश्वगुरु की भूमिका- विद्यासागर सोनकर
# हमारी भाषा, संस्कृति, साहित्य और परंपराएं हमारे अस्तित्व की है आत्मा- सीमा द्विवेदी
जौनपुर।
विश्व प्रकाश श्रीवास्तव
तहलका 24×7
हमारे राष्ट्र की संस्कृतियां और परंपराएं हमारी सामूहिक विरासत हैं। वसुधैव कुटुंबकम की हमारी संस्कृति है। सारा संसार एक परिवार है, हमारे राष्ट्र ने हमेशा एक विश्व गुरु की भूमिका निभाई है। हमारे राष्ट्र की ताकत हमारी विविधता में एकता में निहित है। उक्त बातें मुख्य अतिथि एमएलसी विद्यासागर सोनकर ने सोमवार को जीजीआईसी इण्टर कॉलेज में विविधता में एकता कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा।

उन्होंने कहा कि मुझे इस तथ्य पर गर्व है कि जौनपुर जातीय और सांस्कृतिक रूप से भारत के सबसे विविध क्षेत्रों में से एक हैं। यहां हिंदी भाषी सहित देश के कोने-कोने से लोग आकर बसे है और लोग सामंजस्य में रहकर एक अद्वितीय समग्र संस्कृति का निर्माण किया है। यहां एक तरफ ठेठ भाषा की आवाजें हम सभी को रोमांचित करती हैं, तो दूसरी तरफ भोजपुरी नृत्य और गीत की मधुर मधुर आवाजे हमें और हमारे जिला वासियों को ताजगी से भर देती हैं। मुझे इस तथ्य पर गर्व है कि, हमारा क्षेत्र अनेकता में एकता का बहुत ही आदर्श है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति प्रहलाद सिंह पटेल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में पहली बार दाíजलिंग को राष्ट्रीय स्तर के सास्कृतिक कार्यक्रम की मेजबानी करने का अवसर मिल रहा है।

राज्यसभा सांसद सीमा द्विवेदी ने कहा कि ऐसे राष्ट्रीय कार्यक्रम में हमारे स्थानीय संगीतकारों, गायकों, नर्तकियों और अन्य कलाकारों को अपनी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर देता है। हमारी भाषा, संस्कृति, साहित्य और परंपराएं हमारे अस्तित्व की आत्मा हैं। इस तरह के कार्यक्रम हमारे लोगों, विशेष रूप से हमारे युवाओं को हमारी समृद्ध सास्कृतिक विरासत और पारंपरिक जड़ों से जुड़ने का मौका देते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम उनका संरक्षण करें और उन्हें आगे भी प्रचारित करें।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जिलाध्यक्ष ने कहा कि भारत एक विविधतापूर्ण देश है इसके विभिन्न भागों में भौगोलिक अवस्थाओं, निवासियों और उनकी संस्कृतियों में काफी अन्तर है। कुछ प्रदेश अफ्रीकी रेगिस्तानों जैसे तप्त और शुष्क हैं, तो कुछ ध्रुव प्रदेश की भांति ठण्डे है कहीं वर्षा का अतिरेक है, तो कहीं उसका नितान्त अभाव है, तमिलनाडु, पंजाब और असम के निवासियों को एक साथ देखकर कोई उन्हें एक नस्ल या एक संस्कृति का अंग नहीं मान सकता देश के निवासियों के अलग-अलग धर्म, विविधतापूर्ण भोजन और वस्त्र उतने ही भिन्न हैं, जितनी उनकी भाषाएं या बोलियां ।

















