यूपी पुलिस की कार्यशैली पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी,कहा- संविधान नहीं,सत्ता के प्रति दिखती है निष्ठा
प्रयागराज।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस व्यवस्था और कानून के शासन को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि फील्ड स्तर के कई अधिकारी संविधान और कानून के प्रति अपने दायित्वों के बजाय राजनीतिक वरिष्ठों को संतुष्ट करने के अनुरुप कार्य करते दिखाई देते हैं।न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों की निष्ठा संविधान के बजाय सत्ताधारी प्रतिष्ठान के प्रति अधिक प्रतीत होती है।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार दिवाकर की एकल पीठ ने कहा कि तबादला व्यवस्था से परिचित अधिकारी अक्सर अपने आचरण को राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरुप ढाल लेते हैं।अदालत ने यह भी कहा कि कई अधिकारी कानून के शासन को संवैधानिक दायित्व के बजाय एक परिचालन संबंधी असुविधा मानते हैं।न्यायालय ने टिप्पणी की कि कई मामलों में बिना उचित प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जाती हैं,एफआईआर दुर्भावनापूर्ण इरादों से दर्ज या दबा दी जाती हैं तथा निवारक हिरासत संबंधी प्रावधानों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल होता है।

अदालत के अनुसार दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में उपलब्ध प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की भी अनदेखी की जाती है।यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां निवारण अधिनियम,1986 के तहत दर्ज एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई।

हालांकि, इस कानून से जुड़े कुछ मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय में भी विचाराधीन होने के कारण हाईकोर्ट ने व्यापक कानूनी पहलुओं पर अंतिम राय देने से परहेज किया।अदालत ने राज्य के गृह सचिव की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि नियुक्तियों,विभागीय कार्रवाई की मंजूरी और न्यायालयी मामलों में सरकार की प्रतिक्रिया कई बार निष्पक्ष एवं संवैधानिक प्रशासनिक निर्णय के बजाय अन्य प्रभावों से प्रेरित दिखाई देती है।

















