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Sunday, January 25, 2026

अहंकार के शिखर पर खड़े केजरीवाल के झूठ की नाव आखिर यमुना में डूब गई! 

अहंकार के शिखर पर खड़े केजरीवाल के झूठ की नाव आखिर यमुना में डूब गई! 

# भाजपा की राणनीति या गारन्टी नहीं जीती, बल्कि आम आदमी पार्टी के मुखिया के ‘फरेबी घमण्ड’ की पराजय हुई है, पब्लिक की नजर में उनके ड्रामे की ड्रेस उतर गई। उन्होंने अन्तिम झूठ मतगणना से दो दिन पूर्व बोला कि’ मेरे संभावित विधायक की बोली भाजपा ने 15 करोड़ लगाई! 

# राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘भड़ास 4 मीडिया’ के संपादक यशवंत सिंह ने मतदान से तीन दिन पूर्व ग्राउंड रिपोर्ट में तमाम एग्जिट पोल से हटकर यह साफ़ कर दिया था कि ‘केजरीवाल इस बार नहीं बना पाएंगे दिल्ली में “आप” की सरकार। 

कैलाश सिंह
राजनीतिक संपादक
लखनऊ/दिल्ली। 
तहलका न्यूज नेटवर्क 
                    पुरानी कहावत है जब इंसान का शरीर क्षीण होता है तब बीमारियां घेर लेती हैं और मौत होने पर किसी प्रमुख बीमारी का नाम दे दिया जाता है। ठीक यही हाल आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल का हुआ। उन्होंने झूठ की नींव पर रेत का महल बनाया और इसी के सहारे 12 साल दिल्ली पर शासन किया केन्द्र और राज्य की कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाकर दिल्ली की डेढ़ दशक वाली सरकार को हटाकर 2013 में अपनी सरकार बना ली। यही फार्मूला उन्होंने 2014 से केन्द्र की मोदी वाली भाजपा की सरकार पर आजमाया ही नहीं, बल्कि ‘एक से बढ़कर एक’ तोहमत भी लगाना शुरू कर दिया।
पंजाब में फतह के बाद तो केजरीवाल दिल्ली के खुदमुख्तार बन बैठे और ‘अहंकार के शिखर पर चढ़कर बोलने लगे कि मोदी को मुझे हराने के लिए दूसरा जन्म लेना पड़ेगा।दरअसल केजरीवाल घोटालों के आरोप में जब जेल गए तभी उनके फरेबी ड्रामे का पर्दाफ़ाश हुआ और वह जनसहानुभूति खो बैठे। इसका एहसास उन्हें छोड़कर उनकी पार्टी में सबको हो गया था। फिर भी जमानत पर बाहर आकर उन्होंने झूठ की बारिश करते हुए जनता के बीच इमोशनल कार्ड खेला और मात खा गए।
अन्ना हज़ारे के आंदोलन से राजनेता के रूप में जन्मे अरविंद केजरीवाल ने सबसे पहले खुद को ‘कट्टर ईमानदार’ का तमगा दे दिया जबकि यह सर्टिफिकेट देने का अधिकार केवल जनता के पास होता है। भाजपा के जाल में उनका झूठ ‘शराब और शीश महल’ बनकर पकड़ में आया। इसके बाद तो कमजोर शरीर में बीमारियों सरीखे उनके द्वारा भाजपा पर लगाए गए आरोप उन्हीं पर पलटवार करते हुए गाज़ बनकर गिरने लगे।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि धरती पर ‘सबसे बड़ी जनता की अदालत’ होती है। असल मायने में चुनाव के दौरान ही जनता अपना फैसला सुनाती है। इस फैसले ने एक साथ दो काम किया।
भाजपा का 26 साल का बनवास खत्म किया और झूठ का खात्मा भी हो गया। अन्ना हज़ारे के आंदोलन से निकलते ही आम आदमी पार्टी बनाने वाले केजरीवाल ने पहला दावा किया कि मुझे कुर्सी यानी पॉवर और पैसे का लोभ नहीं है, जाति भेद मैं नहीं करता। उनकी यही बात सच मानकर झुग्गी- झोपड़ी से लेकर मध्यम वर्ग और मुस्लिम वोटर कांग्रेस से हटकर आप के साथ जुड़ गए। केजरीवाल ने पहला ड्रामा पहली बार सीएम पद की शपथ लेने जाते समय अपनी कार वैगनआर पर खेला तो आटो वाले भी समझे कि यह बन्दा अपने बीच का है। इसकी पोल ‘शीश महल’ निर्माण के बाद खुली।
कोरोना रूपी महामारी में दिल्ली के लोग एक अदद आक्सीजन सिलेंडर को भटक रहे थे और केजरीवाल यूपी, बिहार के अपने उन वोटरों को यूपी की सीमा पर छोड़ दिए, भला हो सीएम योगी आदित्यनाथ का जिन्होंने अपनी सरकारी बसों से लोगों को उनके घरों तक पहुंचाया। केजरीवाल को अपने झूठ और पब्लिक की कमजोर याददास्त पर अकल्पनीय भरोसा था। इसी भरोसे ने घमण्ड का रूप लिया जिसने उनकी नाव को यमुना के मझधार में डुबो दिया।
वर्ष 2020 के चुनाव में केजरीवाल ने दिल्ली के लोगों से वायदा किया था कि मुझे जिताया तो अगले पांच साल में यमुना का पानी नहाने ही नहीं, पीने योग्य स्वच्छ बना दूंगा। यदि ऐसा नहीं किया तो अगली बार मुझे वोट मत देना। इस बार वह सोचे कि जनता भूल गई होगी और उन्होंने धड़ल्ले से हरियाणा की भाजपा सरकार पर तोहमत मढ़ दिया कि उसने यमुना के पानी को जहरीला बना दिया, लेकिन जनता ने उन्हें इसी पानी में सराबोर कर दिया।
दिल्ली में मतदान से तीन दिन पूर्व आटो से भ्रमण करते हुए सर्वे कर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करके ‘भडास 4 मीडिया’ के संपादक यशवंत सिंह ने अपने सभी प्लेटफ़ार्म पर साफ़ शब्दों में लिखा ‘इस बार अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी आप दिल्ली में सरकार नहीं बना पाएगी।सभी एग्जिट पोल से अलग लिखने वाले श्री सिंह ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने सड़क, गलियों, मलिन बस्तियों और आटो चालकों की मंशा को उनके मनोभाव और शब्दों से एक्स-रे कर लिया था। यशवंत जी पत्रकारिता के प्रोफेशन में ही नहीं बल्कि अपने जीवन में भी शुरू से कबीरपंथी रहे हैं।
उनके साथ एक मीडिया संस्थान में कुछ साल काम करने का मुझे मौका मिला था, उसी दौरान उनके व्यक्तित्व की छाप खबरों में देखने को मिली। उन्होंने अपने उसी निराले अंदाज में किसी दल की जीत या हार की बजाय जब लिखा कि केजरीवाल इस बार सरकार नहीं बना पाएंगे तो यकीन हो गया कि जनता अबकी ‘आप’ की ढोल बजा देगी।

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