खाद्य पदार्थों में मिलावट का खेल: धीमा जहर, बीमारियों का जखीरा

खाद्य पदार्थों में मिलावट का खेल: धीमा जहर, बीमारियों का जखीरा

# त्योहारों पर रेडिमेड मिठाई से होती है बढ़ती मांग की पूर्ति, बेबस दिखता है शुगर, जांच के नाम पर होती है खानापूर्ति, विभाग बढ़ाता है वसूली की रकम

जौनपुर।
कैलाश सिंह
तहलका 24×7
              सावन में रक्षाबंधन के त्योहार से पूर्व दूध का दाम 100 रुपये का आंकड़ा इस तरह पार किया जैसे वर्षों बाद भारी बारिश और सैलाब दशकों का रिकॉर्ड तोड़ने पर तुला है। बाजार में साइलेंट किलर ‘शुगर’ से भयमुक्त लोगों की भीड़ मछली मार्केट सरीखे मिठाई की दुकानों पर उमड़ी है, जबकि वहां मांग पूरी करने में कानपुर और लखनऊ से खोवा मण्डी में ट्रकों से आने वाली मिठाइयां सहायक बनी हैं।
ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी से प्रशासन अनभिज्ञ है, उसकी आखें इसलिए बन्द रहती हैं क्योंकि जांच करने वाला विभाग उन दुकानदारों और दुधियों, खोवा विक्रेताओं को खोजता है जिनके नाम हफ़्ता वसूली लिस्ट में नहीं जुड़े होते हैं।मिलावटी खाद्य पदार्थों की जांच करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने को शासन ने जिन अफसरों को जिलों में नियुक्त किया है वह अपने आकाओं की जेब भरने के नाम पर अपना भी पेट भरने के आदी हो चुके हैं।
यह बात दावे से इसलिए कही जा रही है क्योंकि ढाई दशक से एक परिचित दुधिया कुछ वर्ष पूर्व एक बाज़ार में मिठाई की दुकान खोला, जिसे अब वह प्रशासन की वसूली से तंग आकर बन्द करने की सोच रहा है, उसका कहना है कि खाद्य विभाग के कथित फूड इंस्पेक्टर तीन हजार माहवारी रकम लेते हैं, लेकिन त्योहारों वाले महीने में यह रकम पांच हजार हो जाती है, मना किया तो नमूना जांच और पेनाल्टी की धमकी को साकार करने में जुट जायेंगे।
इस विभाग की डर से दुधिये भोर से ही ऐसे छिपकर भागते फिरते हैं जैसे एआरटीओ से सवारी वाहन के चालक और नशे का सामान बेचने वाले भागते हैं।दूसरी बानगी कचहरी रोड स्थित आधुनिक स्वीट में देख मेरे समेत मौजूद कई लोग तब दंग रह गए जब एक बड़ा मिठाई विक्रेता वहां बर्फी और समोसा खरीदने आया, उसका कहना था कि हमारा परिवार यहीं का खाद्य पदार्थ पसन्द करता है, उसके जाते ही दुधिया आया और बोला कि आज 110 रुपये किलो का भाव पड़ेगा, यदि आप शुद्धता की जांच न करें तो रेट गिराया जा सकता है, आप समझौता करेंगे नहीं तो हम कहां से भारपाई करेंगे।
ये तो आंखों देखी, कानों सुनी घटनाएं हैं जो प्रशासन की आंख और कान तक नहीं पहुंचती हैं।दरअसल इन्हीं अवरोधों ने खाद्य पदार्थों की शुद्धता को पलीता लगाकर मिलावट को शीर्ष पर कर दिया है।अब तो सुगन्ध में इसेंस सहायक बन गया है। खाद्य विभाग की हालत दारु की दुकानों सरीखी हो चली है, जैसे दारुबाज दाम को लेकर कभी नहीं झगड़ते हैं, उसी तरह हफ़्ता देने वाले दुकानदार कभी नहीं उलझते हैं, उन्हें मिलावटी खोवा, दूध, मेवा और इसेंस के अलावा रेडिमेड मिष्ठान्न बेचने में ही पर्ता पड़ता है, अन्यथा व्यवसाय ही बन्द करना पड़ेगा। दूसरे व्यवसाय में भी ऐसे ही झाम झेलने पड़ेंगे।
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