मजदूर दिवस पर विशेषांक ! मजदूर जिसकी कभी भी मजबूरी ना हो पाई दूर..

मजदूर दिवस पर विशेषांक ! मजदूर जिसकी कभी भी मजबूरी ना हो पाई दूर..

# विश्व के हर देशों में मजदूरों की हालत नहीं सुधरी

# मजदूर दिवस सिर्फ कागजी रस्म बनकर रह गया

बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को, भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को.. अदम गोण्डवी की लाइन मन में आ गई कि मजदूर दिवस पर लिखने से पहले इसके भावार्थ को लोगों को समझना जरूरी है। आज एक मई है, आज ही के दिन 1886 को अमेरिका में शोषण के खिला़फ मज़दूरों ने क्रान्ति की थी। हजारों की संख्या में सड़क पर आए मज़दूरों पर सरकार ने गोली चलवा दी।तभी से मज़दूरों के सम्मान में पूरी दुनिया में एक मई को मज़दूर दिवस मनाते है।

# मई दिवस का इतिहास

हर साल 1 मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है। 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का मुख्य कारण यह है कि 4 मई 1886 को एक बम विस्फोट के 7 पुलिस अधिकारी और 4 शिक्षकों के नागरिक मारे गए थे। उस विस्फोट से एक दिन पहले मजदूरों द्वारा उद्योगपतियों के खिलाफ आंदोलन किया गया था और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को इस रिपोर्ट के जरिए मारा गया। बम विस्फोट के बाद आठ आतंकवादियों की शाजिश का पता लगा और उन सभी दोषियों को आतंकवादी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई। 3 साल बाद समाजवादी पार्टी ने श्रमिक आंदोलन सम्मान देते हुए 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में चयनित किया गया।
मजदूर एक ऐसा शब्द है जिसके बोलने में ही मजबूरी झलकती है। सबसे अधिक मेहनत करने वाला मजदूर आज भी सबसे अधिक बदहाल स्थिति में है। दुनिया में एक भी ऐसा देश नहीं है जहां मजदूरों की स्थिति में सुधार हो पायी हो। दुनिया के सभी देशों की सरकार मजदूरों के हित के लिए बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी करती हैं मगर जब उनकी भलाई के लिए कुछ करने का समय आता है तो सभी पीछे हट जाती है। इसीलिए मजदूरों की स्थिति में सुधार नहीं हो पाता है। भारत में भी मजदूरों की स्थिति बेहतर नहीं है। हमारे देश की सरकार भी मजदूर हितों के लिए बहुत बातें करती है, बहुत सी योजनाएं और कानून बनाती है। मगर जब उनको अमलीजामा पहनाने का समय आता है तो सब इधर-उधर ताकने लग जाते हैं। मजदूर फिर बेचारा मजबूर बनकर रह जाता है।
भारत सहित दुनिया के सभी देशों में एक मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य उस दिन मजदूरों की भलाई के लिए काम करने व मजदूरों में उनके अधिकारों के प्रति जागृति लाना होता है। मगर आज तक तो कहीं ऐसा हो नहीं पाया है। कोरोना महामारी की मार सबसे ज्यादा मजदूर वर्ग पर पड़ी है। इस कारण देश का मजदूर सबसे ज्यादा बदहाल है। मजदूर दिवस दुनिया के सभी कामगारों, श्रमिकों को समर्पित होता है।
किसी भी राष्ट्र की प्रगति करने का प्रमुख भार मजदूर वर्ग के कंधों पर ही होता है। मजदूर वर्ग की कड़ी मेहनत के बल पर ही राष्ट्र तरक्की करता है लेकिन भारत का श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है। हमारे देश में मजदूरों का शोषण आज भी जारी है। समय बीतने के साथ मजदूर दिवस को लेकर श्रमिक तबके में अब कोई खास उत्साह नहीं रह गया है। बढ़ती महंगाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने भी मजदूरों के उत्साह का कम कर दिया है। अब मजदूर दिवस इनके लिए सिर्फ कागजी रस्म बनकर रह गया है।

# मजदूर दिवस की उत्पत्ति

पहले की समय में मजदूरों की हालत बहुत खराब थी। मजदूर लोग बहुत कड़ी मेहनत करते थे और दिन मे 15 घंटे तक काम करते थे और उनके हाथ, पैर में इतनी चोट लगती थी और आर्थिक संकटों का सामना करके काम करते थे,तब उनके काम पैसे दिए जाते थे। लंबे समय तक घंटो भर काम करते थे। स्वास्थय की समस्याओं की बढ़ती हुई संख्या ने इस समस्या को ठीक करने के लिए मजदूरों ने श्रमिक यूनियानो ने इस प्रणाली के खिलाफ आवाज उठाई।

# भारत में मजदूर दिवस समारोह

इस दिन को भारत में ना बल्कि पूरे विश्व में एक विरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसा तब होता है, जब कोई महिला या पुरुष अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर एकजुट होकर अपने अधिकारों ले लिये सभी श्रमिक एक साथ रैली, जुलूस निकालते है। जिससे उनको उनका सही अधिकार मिले। जुलुस के अलावा बच्चों के लिये तरह-तरह की प्रतियोगिताएं होती है। इससे आगे चलकर बच्चे इसमें आगे बढ़कर हिस्सा ले और एकजुटता का सही मतलब समझ सके।
बहुत संघर्षों के बाद श्रमिकों को उनका अधिकार मिला। उन्होंने इस दिवस के लिए बहुत कड़ी मेहनत किया और इस दिवस को महत्व दिया। यह दिन श्रमिको के लिये बहुत महत्वपूर्ण बना। कोरोना काल में सभी बस, ट्रेन बंद हो जाने के कारण लोग पैदल ही अपने घर को लौटने पर मजबूर हो चुके थे। भारत में एक बड़ा तपका प्रवासी है जो छोटे गांव या छोटे शहर से भारत के बड़े शहरों में आ कर प्रवासी मजदूर के रूप में अपना जीवन यापन करते है। मंत्री भारत सरकार खासतौर से उत्तर प्रदेश में मजदूरों के लिए गरीबों के लिए अन्य वितरण की व्यवस्था की गई है लेकिन यही व्यवस्था काफी नहीं है उनके परिवार को शिक्षा के साथ-साथ रोजगार के अवसर मिलने चाहिए।
श्रम दिवस या मजदूर दिवस हमें यह सीखता है कि जैसे हम एक साथ जुटकर मजदूर दिवस के खिलाफ रैली, जुलुस निकाल करके मजदूरों को उनका अधिकार दिलवाते है, ठीक इसी प्रकार हमें एक साथ रहकर किसी भी संकट का सामना करना होगा। उद्योगपतियों के द्वारा श्रम वर्ग पर किया गया अन्याय पूर्वक व्यवहार के खिलाफ क़ानून बनाने में सरकार को लम्बा समय लगा। ट्रेड यूनियनो ने संयुक्त प्रयासों से सरकार श्रमिकों के लिये कानून बनाने के लिये मजबूर किया।
लेखक वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार जी हैं।

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