हीट वेव: इंसानों से ज्यादा खतरे में होते हैं पशु

हीट वेव: इंसानों से ज्यादा खतरे में होते हैं पशु

जौनपुर।
एखलाक खान 
तहलका 24×7 
            तपती धूप,जलती सड़कें,गर्म हवाओं के थपेड़े और लगातार बढ़ता तापमान… हीट वेव सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं,बल्कि पशुओं के लिए उससे कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होती है।फर्क सिर्फ इतना है कि इंसान अपनी परेशानी शब्दों में बता सकता है,पशु अपनी तकलीफ केवल आंखों,सांसों और शरीर की हालत से ही जाहिर कर पाते हैं।जब इंसान घरों में कूलर, एसी और ठंडे पानी का सहारा ले लेते हैं,तब हजारों पशु खुले आसमान के नीचे गर्मी से लड़ते हुए अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं।
गर्मी का असर सबसे ज्यादा उन बेजुबानों पर पड़ता है जो सड़कों,खेतों और खुले स्थानों पर रहते हैं।गाय,भैंस, कुत्ते,बिल्लियां,बकरी,घोड़े और पक्षी तेज धूप में घंटों भटकते रहते हैं।उन्हें न तो पर्याप्त छांव मिलती है और न ही साफ पानी।कई बार लोग खुद गर्मी से परेशान होकर अपने काम में व्यस्त रहते हैं और इन पशुओं की ओर ध्यान ही नहीं दे पाते।यह लापरवाही कई मासूम जानों की मौत का कारण बन जाती है।वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर आलोक सिंह पालीवाल बताते हैं कि हीट वेव के दौरान पशुओं में डिहाइड्रेशन बहुत तेजी से होता है।
उनके शरीर से पानी कम होने लगता है,सांसें तेज हो जाती हैं,शरीर का तापमान बढ़ जाता है और धीरे-धीरे वे हीट स्ट्रोक का शिकार हो जाते हैं।कुत्तों में यह समस्या और भी ज्यादा देखने को मिलती है क्योंकि वे इंसानों की तरह पसीना नहीं निकालते।वे केवल हांफकर अपने शरीर का तापमान नियंत्रित करते हैं।जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो उनका शरीर जवाब देने लगता है।कई बार सड़क किनारे बैठे कुत्ते अचानक बेहोश होकर गिर जाते हैं,लेकिन लोग इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
डॉ. पालीवाल ने बताया कि गाय और भैंस जैसे दुधारु पशुओं पर भी गर्मी का गहरा असर पड़ता है।अत्यधिक तापमान के कारण उनका दूध उत्पादन कम हो जाता है। वे चारा कम खाने लगते हैं और उनका शरीर कमजोर होने लगता है।यदि समय पर देखभाल न हो तो उनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है।गांवों में कई पशुपालक आज भी यह नहीं समझ पाते कि गर्मी केवल इंसानों को नहीं बल्कि पशुओं को भी बीमार बना सकती है।परिणामस्वरूप कई पशु धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।
सबसे दर्दनाक स्थिति उन पक्षियों की होती है जो आसमान में उड़ते हैं लेकिन पानी की तलाश में तड़पते रहते हैं।गर्मी बढ़ने पर तालाब,पोखर और छोटे जलस्रोत सूखने लगते हैं।पेड़ों की संख्या कम होने से उन्हें छांव भी नहीं मिलती।कई बार छोटे पक्षी गर्मी सहन नहीं कर पाते और जमीन पर गिरकर दम तोड़ देते हैं।अगर हर घर की छत पर या बालकनी में सिर्फ एक कटोरा पानी रख दिया जाए तो अनगिनत पक्षियों की जान बचाई जा सकती है।हीट वेव का असर केव शरीर पर ही नहीं बल्कि पशुओं के व्यवहार पर भी पड़ता है।गर्मी से परेशान पशु चिड़चिड़े हो जाते हैं।
वे खाना कम खाते हैं,सुस्त पड़ जाते हैं और कई बार आक्रामक भी हो सकते हैं।पालतू जानवरों में उल्टी, दस्त,कमजोरी और तेज बुखार जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।यदि समय पर इलाज न मिले तो स्थिति जानलेवा बन सकती है।यही कारण है कि गर्मियों में पशु चिकित्सकों की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।जब पूरा समाज दोपहर की धूप से बचने के लिए घरों में रहता है,तब पशु चिकित्सक गांव-गांव जाकर बीमार पशुओं का इलाज करते हैं।कई बार 45 डिग्री तापमान में भी उन्हें खेतों और सड़कों पर जाना पड़ता है।
पशु डॉक्टर केवल इलाज नहीं करते,बल्कि उन बेजुबानों की आखिरी उम्मीद बन जाते हैं जो बोल नहीं सकते। एक पशु के बचने का मतलब केवल एक जान बचना नहीं होता,बल्कि एक किसान की रोजी-रोटी,एक परिवार की भावनाएं और कई बार पूरे घर की आर्थिक स्थिति बच जाती है।गर्मी के दिनों में कुछ छोटी-छोटी सावधानियां पशुओं की जिंदगी बचा सकती हैं।पशुओं को दिन में कई बार साफ और ठंडा पानी देना चाहिए। उन्हें सीधे धूप में बांधकर नहीं रखना चाहिए।पशु शेड में पंखा,कूलर या पानी का छिड़काव करना बेहद जरूरी है।
दुधारु पशुओं को सुबह और शाम के समय ही बाहर निकालना चाहिए।कुत्तों और बिल्लियों को गर्म सड़क पर ज्यादा देर नहीं चलाना चाहिए क्योंकि गर्म जमीन उनके पंजों को जला सकती है।पक्षियों के लिए घरों और पेड़ों के पास पानी रखना चाहिए।डॉ. पालीवाल ने कहा आज सबसे बड़ी जरूरत सिर्फ सरकारी योजनाओं की नहीं बल्कि संवेदनशील सोच की है।अगर हर इंसान यह समझ जाए कि गर्मी केवल उसे नहीं बल्कि उसके आसपास रहने वाले हर जीव को प्रभावित कर रही है, तो हजारों पशुओं की जान बचाई जा सकती है।
सड़क किनारे बैठे प्यासे कुत्ते को पानी देना,किसी गाय को छांव तक पहुंचाना या पक्षियों के लिए पानी रखना बहुत छोटा काम लग सकता है,लेकिन किसी बेजुबान के लिए वही जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाता है।दुख की बात यह है कि समाज में पशुओं की पीड़ा को आज भी उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी इंसानों की।जब किसी इंसान को लू लगती है तो तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाता है,लेकिन कोई पशु सड़क किनारे तड़पता रहे तो अक्सर लोग आगे बढ़ जाते हैं। यह सोच बदलने की जरुरत है।
पशु भी दर्द महसूस करते हैं,उन्हें भी प्यास लगती है,उन्हें भी डर और तकलीफ होती है।वे बोल नहीं सकते,इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता।डॉ. आलोक सिंह पालीवाल ने अपील की कि हीट वेव केवल मौसम की समस्या नहीं है,यह मानवता की परीक्षा भी है।यह वह समय है जब हमें यह तय करना होता है कि हम सिर्फ अपने बारे में सोचेंगे या उन बेजुबानों के लिए भी कुछ करेंगे जो पूरी तरह इंसानों की दया और संवेदनशीलता पर निर्भर हैं।
अगर इंसान चाह ले तो हर गली,हर गांव और हर शहर में हजारों पशुओं को गर्मी से बचाया जा सकता है।जब अगली बार तेज धूप में कोई कुत्ता हांफता हुआ दिखे, कोई गाय छांव तलाशती नजर आए या कोई पक्षी पानी के लिए भटकता दिखाई दे,तो सिर्फ तमाशबीन मत बनिए।एक कटोरा पानी,थोड़ी सी छांव और थोड़ा सा दया भाव किसी की जिंदगी बचा सकता है।क्योंकि सच यही है कि हीट वेव में इंसानों से ज्यादा खतरे में पशु होते हैं,और उन्हें बचाने की जिम्मेदारी भी इंसानों की ही है।
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