जान पर खेलकर जीवन बचाना: फील्ड में बड़े जानवरों की सर्जरी की चुनौतियां और विजय गाथा
डा. आलोक सिंह पालीवाल
तहलका 24×7 विशेष
फील्ड में बड़े जानवरों की सर्जरी करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है। गांव-देहात की परिस्थितियां, सीमित संसाधन, समय पर बिजली और उपकरणों की कमी, प्रशिक्षित स्टाफ का अभाव और साथ ही पशु मालिकों की आर्थिक विवशता इन सभी के बीच एक पशु चिकित्सक का सर्जन के रुप में खड़ा होना किसी योद्धा से कम नहीं। जब सामने एक गाय प्रसव पीड़ा से कराह रही हो और उसका बच्चा मर चुका हो, तब उस मां को बचाना केवल एक ऑपरेशन नहीं होता, बल्कि किसान की उम्मीदों और पशु के जीवन के बीच की लड़ाई होती है।

अब तक मैंने 79 गायों में मृत भ्रूण निकालने की सर्जरी की है, जिनमें से 52 गायों को सफलतापूर्वक जीवनदान दिया गया।ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, हर सर्जरी एक संघर्ष, एक कहानी थी। कभी आधी रात को खेत में, कभी बारिश के बीच, कभी बैटरी की टॉर्च की रोशनी में हर बार मेरी सोच बस इतनी होती थी कि“अगर हम नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?”एक बार रात को ग्यारह बजे गांव से फोन आया, एक गाय 48 घंटे से प्रसव पीड़ा में थी, बच्चा पेट में सड़ रहा था।

चार डॉक्टर मना कर चुके थे। मैं गया और ऑपरेशन किया। गाय बची, किसान आज भी हर त्यौहार पर आशीर्वाद देने आता है।भैंसों की सर्जरी और भी जटिल होती है। उनका शरीर भारी और मांसल होता है, जिससे सर्जिकल एक्सेस और मैनीपुलेशन मुश्किल हो जाता है। अब तक मैंने 32 भैंसों में मृत भ्रूण की सर्जरी की है, जिनमें से 18 भैंसों को सफलतापूर्वक बचाया गया। एक बार एक भैंस का गर्भस्थ शिशु गर्दन में उलझा हुआ था और गर्भाशय में फंस गया था। उसे निकालना किसी पहेली को सुलझाने से कम नहीं था।

चार घंटे तक प्रयास के बाद जब बच्चा बाहर आया, तो भैंस के साथ किसान की आंखों में भी राहत थी।ऐसी परिस्थितियों में न तो ऑपरेशन टेबल होती है, न ही मशीनें, सिर्फ अनुभव, हिम्मत और पशु के लिए करुणा साथ होती है।सिर्फ प्रसव नहीं, दुर्घटना के कारण जबड़े की हड्डियां टूटना भी एक गंभीर मामला है। जानवर चारा नहीं खा पाता, कमजोर होता है और जल्दी मर जाता है। मैंने अब तक 15 जबड़े की बोन पिनिंग की सर्जरी की, जिनमें से 14 सफल रही हैं। ये सर्जरी अत्यंत सटीकता मांगती है।

पिन की लंबाई, दिशा और दबाव अगर जरा सा भी गलत हो जाए तो जानवर का मुंह हमेशा के लिए टेढ़ा हो सकता है। एक बैल जो हल जोतते समय गिर पड़ा था, उसका जबड़ा पूरी तरह अलग हो गया था।लोग उसे मारने की सलाह दे रहे थे, बोन पिनिंग कर उसे फिर से चारा खाने लायक बना दिया। वो बैल आज भी खेत में हल खींचता है और किसान मुझे भगवान कहता है। इन सभी सर्जरी में एक बात सामान्य रही, स्थिति हमेशा चुनौतीपूर्ण थी, और संसाधन सीमित। लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी। कई बार बिना बिजली के, बिना किसी सहायक के, अकेले ही सर्जरी की है।

कीचड़ में खड़े होकर, गर्मी में पसीने से तरबतर होकर, सांस रोककर टांके लगाए हैं। जब जानवर फिर से खड़ा होता है, अपनी आंखों से जीवन के लिए आभार जताता है, तो सारी थकान हवा हो जाती है।इन अनुभवों से मुझे ये सीख मिली है कि पशु चिकित्सा सिर्फ डिग्री का काम नहीं है, ये एक सेवा है, एक समर्पण है, एक मानसिक और भावनात्मक प्रतिबद्धता है। जब तक हम फील्ड में काम करते हैं, हमें हर बार नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, हर जानवर एक नई किताब की तरह होता है।

लेकिन एक बात निश्चित है, अगर इरादा नेक हो, तो कामयाबी जरुर मिलती है।आज जब मैं इन आंकड़ों को देखता हूँ, 79 गायों की सर्जरी, 32 भैंसों की, 15 बोन पिनिंग केस तो इनमें मुझे सिर्फ संख्या नहीं दिखती, बल्कि हर केस के पीछे एक संघर्ष और सफलता की कहानी दिखाई देती है।हर ऑपरेशन में किसान की उम्मीद, पशु का दर्द और मेरे हाथों की जिम्मेदारी जुड़ी होती है। युवाओं से भी यही कहना चाहता हूँ कि इस पेशे को सिर्फ एक सरकारी नौकरी या निजी आय का साधन न समझें। यह आपके हाथों में जीवन देने की शक्ति है।

आपकी सर्जरी किसी परिवार की आजीविका बचा सकती है, किसी बच्चे के लिए उसकी गाय मां जैसी होती है। जब आप एक पशु को ठीक करते हैं तो आप केवल एक जान नहीं बचाते, बल्कि उस पशु से जुड़े पूरे परिवार में एक नई रोशनी भरते हैं।यह लेख मेरे अनुभवों का सार है, साथ ही उन हजारों वेटरनरी डॉक्टर्स को भी सलाम है, जो खेतों, पगडंडियों और दूर-दराज के गांवों में काम कर रहे हैं। उनकी मेहनत, संघर्ष और संकल्प ही इस देश की पशु चिकित्सा की असली रीढ़ है।

अगर हम सब मिलकर इस सेवा को भावनात्मक जिम्मेदारी के साथ निभाएं तो कोई पशु इलाज के बिना नहीं मरेगा।फील्ड में सर्जरी करना आसान नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। बस दिल में समर्पण, हाथ में हुनर और दिमाग में आत्मविश्वास हो तो सबसे कठिन केस भी सफलता में बदल जाते हैं। यही मेरी कहानी है। पसीने की, संघर्ष की, और जीवन के लिए जंग जीत लेने की।
(लेखक: डा.आलोक सिंह पालीवाल, पालीवाल पेट्स क्लीनिक एंड सर्जिकल सेंटर के संचालक हैं)

















