धनतेरस एवं प्रकाश पर्व दीपावली पर तहलका 24×7 विशेष….
स्पेशल डेस्क।
राजकुमार अश्क
तहलका 24×7
सर्व प्रथम तहलका 24×7 परिवार की तरफ से समस्त सम्मानित सुधी पाठकों को प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं एवं ढेरों बधाई… जिस प्रकार हिन्दू धर्म मे अन्य त्योहारो का अपना एक विशेष इतिहास एवं महत्व है और उनसे जुड़ी अनेक मान्यताएं, परम्पराएं रीति-रिवाज है ठीक उसी प्रकार धनतेरस एवं दीपावली से भी जुड़ी अनेकों परम्पराएं है जिनका सम्बन्ध सिर्फ हिन्दू धर्म से ही नहीं अपितु अन्य धर्मो से भी जुड़ा अपना एक अलग ही प्रसंग है। तो आइए जानते हैं धनतेरस और दीपावली से जुड़ी खास एंव दिलचस्प बातें…

# धनतेरस
दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब देवता और असुर मिल कर समुद्र मंथन कर रहे थे तो उसमें से उत्पन्न होने वाले नौ रत्नों में से एक भगवान धनवंतरी भी थे और यह वही दिन था जब आयुर्वेद के जनक कहे जाने वाले भगवान धन्वंतरि का धरा पर अवतरण हुआ था। जिन्हें देवताओं का वैद्य भी कहा जाता है। हमारे पवित्र ग्रंथो में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को कामधेनु, त्रयोदशी को धन्वंतरि, चतुर्दशी को महाकाली और अमावस्या को महालक्ष्मी का अवतरण हुआ था। भगवान धन्वंतरि की चार भुजाएँ थी जिनमें अमृत कलश, औषधि, शंख और चक्र विद्यमान थे। अपने अवतरण के समय ही उन्होंने मानव को आयुर्वेद का ज्ञान कराया था। आयुर्वेद के सम्बन्ध में कहा जाता है कि इसका सर्वप्रथम ज्ञान अश्विनी कुमारों को हुआ और अश्विनी कुमारों ने यह विद्या इंद्र को सिखाई। इंद्र ने धन्वंतरि को इसका ज्ञान दिया था। उसके बाद ही इसका प्रसार वसुंधरा पर हुआ। आयुर्वेद के अनुसार सुश्रुत विश्व के पहले शल्य चिकित्सक थे। जिन्होने सुश्रुतसंहिता लिखी है। जिसका आज भी आयुर्वेद के चिकित्सक गहन अध्ययन करके आयुर्वेद के ज्ञान प्राप्त करते हैं।

धनतेरस के दिन धातु से बने सामानों को भी खरीदने की परम्परा है, जिसको लोग शुभ मानते हैं। एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की भी पूजा करने तथा उन्हें दीपक जला कर प्रसन्न करने की परम्परा भी है। एक प्रचलित कथा के अनुसार बहुत समय पहले एक नरेश थे जिनका नाम हैम था बहुत तपस्या के पश्चात उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई मगर जब राजकुमार का विवाह होगा उसके चार दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी ज्योतिषियों ने ऐसी भविष्यवाणी की थी। राजा ने पूरी सावधानी बरती कि राजकुमार की दृष्टि किसी स्त्री पर न पडे़, मगर एक दिन एक राजकुमारी पर दृष्टि पड़ जाने के बाद राजकुमार ने उस कन्या से गन्धर्व विवाह कर लिया। विधि के लेख के अनुसार राजकुमार की मृत्यु हो गई। जब यमदूत उस राजकुमार को लेकर यमराज के सामने पहुंचे तो उन्होंने राजकुमारी के विलाप करने का मार्मिक दृश्य बताया और अकाल मृत्यु से बचने का कारण पूछा। यमराज ने बताया कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा में रखेगा उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा, तभी से यह परम्परा चली आ रही है।

# दीवाली मनाने का धार्मिक कारण
दीवाली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है यह त्योहार अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अक्टूबर-नवंबर मे मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि दीवाली के ही दिन भगवान् श्रीराम अपने पिता द्वारा दिए गए चौदह वर्ष के वनवास की अवधि को पूर्ण करके अपनी पत्नी माता सीता और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आए थे। अपनी खुशी का इज़हार करने के लिए भगवान राम के स्वागत में पूरे नगर के लोगो ने दीपों से सजाया था। चूंकि वह रात अमावस्या की काली अंधेरी रात थी इसलिए नगरवासियो ने दीप जलाकर पूरे नगर को ही पूनम की रात मे बदल दिया था। तब से लेकर आज तक यह परम्परा चली आ रही है।
दूसरी मान्यता के अनुसार दीवाली के ही दिन माॅ दुर्गा ने काली का विकराल रूप धर के असूरो का नाश किया था। वहीं जैन धर्म के अनुसार आज ही के दिन जैन धर्म के संस्थापक भगवान् महावीर स्वामी को तीन दिन के ध्यान के बाद निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति हुई थी। बौद्ध धर्म के अनुसार दीवाली के ही दिन सम्राट अशोक ने हिंसा का मार्ग छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था इसीलिए इस दिन को बौद्ध धर्म को मानने वाले विजय दशमी के रूप मे भी मनाते है। सिख धर्म की मान्यता के अनुसार दीवाली के दिन ही सिखों के दशवें गुरू गुरू गोविन्द सिह जहांगीर की कैद से मुक्त हुए थे इस कारण सिख लोग इसे ‘बन्दी छोड़ दिवस” के रूप मे मनाते है। महान समाज सुधारक, चिंतक और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती को निर्वाण भी दीवाली के ही दिन प्राप्त हुआ था। वेदों के महान ज्ञाता और विद्वान स्वामी रामतीर्थ ने भी अपनी देह इसी दिन त्यागी थी। महाभारत काल का भी सम्बन्ध इस पर्व से है इसी इसी दिन दुर्योधन द्वारा दिए गए वनवास एवं एक वर्ष के अज्ञातवास की अवधि को पूर्ण करके पांडव वापस आए थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार इसी दिन माॅ लक्ष्मी क्षीर सागर मे प्रकट हुइ थी तथा विष्णु जी से विवाह भी इसी दिन हुआ था।
दीवाली पर कई राज्यों में ब्रम्ह मुहूर्त मे उठकर सूप बजाते हुए माता लक्ष्मी के आगमन का आह्वान करने की भी परम्परा है। कई जगह सर-खंठी का हुक्का बना कर उसे जलाकर पूरे घर मे घुमाने के बाद बुझाकर छत पर फेंक दिया जाता है ऐसा करने के पीछे मान्यता यह है कि इससे घर मे मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाता है। दीपावली पर मंदिरों मे नया झाड़ू दान करने की भी परम्परा भी कई राज्यो मे है। 
# दीपावली मनाने का वैज्ञानिक कारण
आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के अनुसार जब दो संधियाँ या दो मौसम परिवर्तन काल से गुजरते हैं तो उस समय मनुष्य के शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं की सक्रियता बढ़ जाती है, चूंकि दीपावली भी वर्षा ऋतु के निगमन और शरद ऋतु के आगमन का समय होता है ऐसे में हमारे ऋषि मुनियों ने बहुत ही वैज्ञानिक आधार पर दीप प्रज्ज्वलित करके वातावरण को शुद्ध एवं कीटाणु मुक्त करने की परम्परा बनाई थी।जिन मिट्टी के दीपों में पंच तैल (सरसों, नारियल, महुआ, तिल, नीम) एंव देशी घी का प्रयोग करके उसको जलाया जाता है और उससे जो लौ उठती है वह अपने आस-पास के वातावरण को शुद्ध करने के साथ कीटाणु रहित भी कर देती है। जिससे बीमारियों के फैलने का खतरा कम हो जाता है। यह प्रकाश पर्व दीपावली सिर्फ अपने ही देश मे नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में अनेक नामों से प्रचलित है जैसे मलेशिया मे इसे हरि दीवाली तो अपने पड़ोसी देश नेपाल मे इसे तिहार के नाम से जाना जाता है।
















