ननिहाल की मिट्टी पर लौटी विरासत: जौनपुर में भावुक हुईं जूही बब्बर

ननिहाल की मिट्टी पर लौटी विरासत: जौनपुर में भावुक हुईं जूही बब्बर

खेतासराय, जौनपुर। 
डॉ. सुरेश कुमार 
तहलका 24×7 
             जौनपुर की सरजमीं ने एक ऐसा भावनात्मक दृश्य देखा, जहां कला,इतिहास,साहित्य और पारिवारिक स्मृतियां एक साथ जीवंत हो उठीं।बॉलीवुड और रंगमंच की चर्चित अभिनेत्री जूही बब्बर अपने ननिहाल की धरती पर पहुंची तो उनकी आंखों में केवल एक कलाकार की चमक नहीं थी,बल्कि एक नातिन की संवेदनाएं भी साफ दिखाई दे रही थीं।
उन्होंने कहा कि जौनपुर मेरे लिए केवल एक शहर नहीं,बल्कि मेरी रूह से जुड़ी वह मिट्टी है,जहां मेरे नाना-नानी की यादें सांस लेती हैं।
कलेक्ट्रेट परिसर स्थित प्रेक्षागृह में वह अपने नाना-नानी के संघर्ष,प्रेम, विचार और सामाजिक योगदान पर आधारित एकल नाटक प्रस्तुत करेंगी।इस नाटक की विशेषता यह है कि इसके सभी पात्रों को स्वयं जूही बब्बर मंच पर जीवंत करेंगी।यह प्रस्तुति केवल रंगमंच नहीं,बल्कि अपनी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक भावुक प्रयास होगा।

# सज्जाद ज़हीर (जूही बब्बर के नाना): जिसने साहित्य को इंक़लाब की जुबान दी

सज्जाद ज़हीर केवल एक साहित्यकार नहीं थे,बल्कि विचारों के ऐसे मुजाहिद थे।जिन्होंने कलम को सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया।क्षेत्र के कलापुर गांव से निकलकर उन्होंने विश्व साहित्य और प्रगतिशील चिंतन में अपनी अमिट पहचान बनाई।सन् 1932 में प्रकाशित पुस्तक अंगारे ने उस दौर के समाज में भूचाल ला दिया था।यह पुस्तक केवल कहानियों का संग्रह नहीं थी,बल्कि रूढ़ियों,कट्टरता और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ उठी एक तेज आवाज थी।
पुस्तक पर प्रतिबंध लगा,प्रतियां जला दी गईं,फ़तवे जारी हुए,मगर विचारों की आग बुझ नहीं सकी।इसी आग से आगे चलकर 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का जन्म हुआ।जिसकी स्थापना में सज्जाद ज़हीर की केंद्रीय भूमिका रही।उन्होंने साहित्य को महज मनोरंजन नहीं,बल्कि समाज सुधार और इंसाफ की लड़ाई का माध्यम माना।उनकी सोच में मार्क्सवाद की वैचारिक गहराई थी,लेकिन दिल हिंदुस्तान की गरीब और दबे-कुचले जनता के लिए धड़कता था।उन्होंने अपनी रचनाओं में नौकरानियों,मज़दूरों और हाशिए पर खड़े लोगों की पीड़ा को आवाज दी।

# राजिया ज़हीर (जूही की नानी): परदे के पीछे नहीं, शिक्षा की रोशनी में जीने वाली महिला

उस दौर में जब महिलाओं की शिक्षा को समाज संदेह की नजर से देखता था।तब राजिया जहीर ने शिक्षा और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की।सज्जाद ज़हीर ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय भेजा।यह फैसला उस समय किसी सामाजिक क्रांति से कम नहीं था।शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने लखनऊ के कई शिक्षण संस्थानों में अध्यापन का कार्य किया और महिला शिक्षा को नई दिशा दी।जूही बब्बर ने अपनी नानी को याद करते हुए कहा कि उन्होंने उस दौर में वह साहस दिखाया,जब महिलाओं के सपनों को घर की चारदीवारी में कैद कर दिया जाता था।राजिया ज़हीर की कहानी केवल एक महिला की कहानी नहीं,बल्कि उस युग की हर उस स्त्री की आवाज है जिसने संघर्षों के बीच अपने अस्तित्व को पहचान दी।

# अंगारे से रौशनाई तक: एक आंदोलन जिसने साहित्य की दिशा बदल दी

सज्जाद ज़हीर ने केवल किताबें नहीं लिखीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन खड़ा किया।लंदन की एक रात,नक़ूश-ए-जिंदाँ,रौशनाई और पिघलते नीलम जैसी रचनाओं ने उर्दू साहित्य को नई दृष्टि दी।उन्होंने पश्चिमी साहित्यिक तकनीकों Stream of Consciousness और Interior Monologue को भारतीय सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक लगता है। रावलपिंडी साज़िश केस में जेल की यातनाएं झेलने के बाद भी उनके विचार कमजोर नहीं पड़े।उन्होंने साहित्य को हमेशा इंसाफ़, बराबरी और इंसानियत की आवाज बनाए रखा।आज जब समाज फिर वैचारिक संघर्षों से गुजर रहा है,तब सज्जाद ज़हीर की प्रगतिशील चेतना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है।

# अभिनय और रंगमंच की समृद्ध विरासत से जुड़ी हैं जूही बब्बर

जूही बब्बर हिंदी सिनेमा और रंगमंच की प्रतिष्ठित पारिवारिक विरासत से संबंध रखती हैं।उनके पिता राज बब्बर हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता होने के साथ सक्रिय राजनेता भी रहे हैं।उन्होंने इंसाफ का तराजू,निकाह,प्रेम गीत और वारिस जैसी कई चर्चित फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के बीच विशेष पहचान बनाई।गंभीर और संवेदनशील अभिनय शैली के कारण राज बब्बर लंबे समय तक हिंदी सिनेमा के प्रमुख कलाकारों में गिने जाते रहे।वहीं माता नादिरा बब्बर भारतीय रंगमंच की बेहद सम्मानित और सशक्त हस्ती थीं।
उन्होंने प्रसिद्ध थिएटर संस्था एकजुट की स्थापना की,सामाजिक सरोकारों से जुड़े अनेक प्रभावशाली नाटकों का निर्देशन किया।नादिरा बब्बर ने थिएटर के माध्यम से नई प्रतिभाओं को मंच दिया और हिंदी रंगमंच को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।इसी सांस्कृतिक और कलात्मक वातावरण में पली-बढ़ीं जूही बब्बर को अभिनय, साहित्य और मंचीय अभिव्यक्ति की कला विरासत में मिली।फिल्मों और टेलीविजन के साथ-साथ उन्होंने रंगमंच पर भी अपनी अलग पहचान बनाई।जूही बब्बर आज अपने परिवार की उसी सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कला और साहित्य के माध्यम से समाज से जुड़ाव कायम रखे हुए हैं।

# जब गांव की गलियों में लौटीं जूही बब्बर: भावनाओं से भर उठा कलांपुर

देर शाम जब जूही बब्बर अपने नाना-नानी के गांव कलापुर पहुंची, तो पूरा इलाका मानो अपनी बेटी के स्वागत में उमड़ पड़ा।ग्रामीणों ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया।उन्होंने गांव की गलियों में घूमकर पुरानी स्मृतियों को महसूस किया,लोगों से मुलाकात की और अपने पूर्वजों की मिट्टी को नमन किया।वहां मौजूद लोगों के लिए यह केवल किसी अभिनेत्री का आगमन नहीं,अपनी सांस्कृतिक विरासत का लौटना था।जौनपुर की यह शाम केवल एक आयोजन नहीं,बल्कि इतिहास,साहित्य,रंगमंच और रिश्तों का ऐसा संगम बन गई,जिसने हर संवेदनशील दिल को छू लिया।यह प्रस्तुति आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाएगी कि विचार कभी मरते नहीं वे पीढ़ियों की स्मृतियों में जीवित रहते हैं,ठीक वैसे ही जैसे सज्जाद ज़हीर और राजिया ज़हीर आज भी जौनपुर की मिट्टी में सांस लेते महसूस होते हैं।
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