बेटे-बेटी की गवाही पर पिता को 10 साल की कैद
# प्रताड़ना से तंग पत्नी ने दी थी जान, जज ने की अहम टिप्पणी
बरेली।
तहलका 24×7
अपर सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक प्रथम रवि कुमार दिवाकर ने एक फैसला देवी-देवताओं का उदाहरण देते हुए सुनाया है। मारपीट कर उत्पीड़न से परेशान होकर आत्महत्या करने के मामले में बेटे और बेटी की गवाही पर पिता को 10 साल की सजा के साथ 50 हजार रुपये का अर्थदण्ड भी लगाया।जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता दिगंबर सिंह पटेल ने बताया कि बारादरी थाना क्षेत्र के संजय नगर में रहने वाली वंदना ने 29-30 नवंबर 2023 की रात को आत्महत्या कर ली थी।

वंदना की मां ने उसके पति और परिजनों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और मारपीट का मुकदमा दर्ज कराया था। पुलिस ने जांच की तो पता चला कि आरोपी पति विकास उपाध्याय शराब पीने का आदी था। आए दिन छोटी-छोटी बातों पर पत्नी वंदना के साथ मारपीट करता और उसका उत्पीड़न करता था। वंदना और विकास का 11 साल का बेटा आयुष्मान और 9 साल की बेटी रितिका है। पति के उत्पीड़न और तानों से परेशान होकर वंदना ने आत्महत्या कर ली थी। पुलिस ने मुकदमा दर्ज करते हुए आरोपी पति को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया और मामला तब से कोर्ट में विचाराधीन था।

जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता दिगंबर सिंह पटेल ने बताया कि मृतक वंदना के बेटे आयुष्मान और बेटी रितिका ने अदालत में अपने पिता विकास के खिलाफ गवाई दी। गवाही के आधार पर अपर सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक प्रथम की अदालत ने वंदना के आत्महत्या के मामले में उसके पति विकास उपाध्याय को दोषी मानते हुए 10 वर्ष की सजा सुनाते हुए 50 हजार रुपये का अर्थ दंड लगाया है। जज ने अपने फैसले में लिखा है कि भारतवर्ष में महिला को देवी का दर्जा तो देते हैं, लेकिन महिला होने का अधिकार नहीं देते। यदि भारतीय पुरुष वास्तव में महिला को देवी का दर्जा देते तो क्या शराब पीकर पत्नी को जानवरों की तरह मारते-पीते और गाली गलौज करते।

कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि वंदना एमए इंग्लिश लिटरेचर तक पढ़ी थी। जाहिर है कि वंदना बहुत कष्ट में रही होगी इसलिए एक बेटा और एक बेटी होने के बावजूद उसने आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाया। वंदना एक शिक्षित महिला थी, इसलिए वह भली भांति जानती थी कि दुनिया से विदा होने के बाद उसके दोनों बच्चों का भविष्य क्या होगा। दोनों बच्चे जीवन भर बिना मां के पीड़ा में रहेंगे। न्यायालय के द्वारा शायद मृतक वंदना के बच्चों की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि इस निर्णय के माध्यम से विशेष कर युवाओं और शादीशुदा महिलाओं से आग्रह करूंगा कि वह जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थितियां आएं, वह उसका डटकर मुकाबला करें। किसी भी हालत में भगवान द्वारा दिए गए अनमोल जीवन को कदापि समाप्त न करें। क्योंकि जीवन भगवान देता है और उसे किसी भी व्यक्ति को स्वयं से लेने का अधिकार नहीं है। जीवन एक तपस्या है। परेशानियों से डरने की जरूरत नहीं, क्योंकि रात कितनी भी काली क्यों ना हो उसके बाद सुबह जरूर होती है।

















