भारत सरकार कर सकती है न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई
नई दिल्ली।
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दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास में मार्च 2024 में होली के आसपास आग लगने की घटना ने सभी को चौंका दिया था। इस घटना की जांच के दौरान उनके नई दिल्ली स्थित आवास से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की गई। यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें नकदी की पुष्टि की गई।

रिपोर्ट के बाद केंद्र सरकार गंभीरता से विचार कर रही है कि मानसून सत्र के दौरान न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाए। यह प्रस्ताव यदि लाया जाता है तो भारत के संवैधानिक इतिहास में यह एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण मामला होगा। क्योंकि न्यायपालिका में इस स्तर की जवाबदेही की कार्रवाई विरले ही होती है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) (सुप्रीम कोर्ट के लिए) और 218 (हाई कोर्ट के लिए) के तहत, किसी न्यायाधीश को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया ‘महाभियोग’ के माध्यम से की जाती है।

इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव की आवश्यकता होती है। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद की समिति द्वारा जांच की जाती है।जांच समिति न्यायाधीश को दोषी मानती है तो यह रिपोर्ट संसद को दी जाती है, जहां दोनों सदनों को विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है।

यदि प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित हो जाता है तो अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के हाथ में होता है, जो उस न्यायाधीश को उनके पद से हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। भारत में न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की कई मिसालें हैं, जिसमें 1993 में न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी, 2011 में न्यायमूर्ति सौमित्र सेन और हाल ही 2024 में न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव। हालांकि, इन मामलों में अधिकांश न्यायाधीशों ने महाभियोग प्रस्ताव पारित होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।


















