भावुक हुए ललई, बोले…. हमने सर्वप्रिय नेता नहीं पितातुल्य अभिभावक खोया है

भावुक हुए ललई, बोले…. हमने सर्वप्रिय नेता नहीं पितातुल्य अभिभावक खोया है

# नेताजी की श्रद्धांजलि सभा मे सपाईयों ने अर्पित किया श्रद्धा-सुमन 

शाहगंज।
रवि शंकर वर्मा
तहलका 24×7
              हमने सर्वप्रिय नेता नहीं पितातुल्य अभिभावक खो दिया है यह कहते हुए भावुक हो गए पूर्वमंत्री शैलेंद्र यादव ललई… वे खुटहन के मुबारकपुर में आयोजित धरती-पुत्र मुलायम सिंह यादव की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित कर रहे थे। श्रद्धांजलि सभा में सर्वप्रथम पूर्व रक्षामंत्री एंव पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पुष्पांजलि के साथ श्रद्धा-सुमन अर्पित किया गया।
नेताजी के देहावसान के उपरांत समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्वमंत्री शैलेंद्र यादव ललई ने पहली बार किसी सार्वजनिक सभा में शिरकत किया। दिवंगत मुलायम सिंह यादव को याद करते हुए शैलेंद्र यादव ललई बेहद भावुक हो गए। श्रद्धांजलि सभा में अपने संबोधन के दौरान ललई यादव ने उन पलों को याद किया जब-जब मुलायम सिंह यादव का सानिध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि जब 2003 में उन्हें नेताजी ने मंत्री बनाया तो उन्होंने कहा था कि “ललई… कभी भी डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के पथ से मत भटकना” वहीं इस विधानसभा चुनाव के बाद उनका कुशल-क्षेम लेने के दौरान नेताजी ने पूछ लिया कि “ललई तुम कैसे हार गए”
श्री यादव ने कहा कि नेताजी सिर्फ हमारे नेता ही नहीं थे बल्कि हमारे पितातुल्य अभिभावक थे। नेताजी का नैसर्गिक गुण था कि जिसकी भी एक बार नेताजी से मुलाकात हो जाती थी उसका नाम वह जीवन भर नहीं भूलते थे और भरी भीड़ में नाम के साथ सम्बोधित करते हुए अपने पास बुलाते थे। नेताजी इस प्रदेश के इतना करीब से जानते थे कि अगर वह लखनऊ बलिया की तरफ जा रहे होते तो हेलीकॉप्टर से ही देखकर पहचान लेते थे कि नीचे कौन सा गांव है। नेताजी जिस जनसभा में जाते थे वहां पचासों लोगों का नाम लेकर अपने पास बुला कर हाल-चाल लेते थे। उन्होंने गांव के खेत खलियान से निकलकर पार्लियामेंट तक समाजवाद की जो अलख जलाई उसकी अब कोई दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती।
श्री ललई ने कहा कि इस देश में बहुत सारे रक्षामंत्री रहे मैं किसी पर टिप्पणी नहीं करता लेकिन नेताजी ने रक्षामंत्री रहते हुए जो मान सम्मान देश के फौजियों को दिया वह एक नजीर बन गया है। पहले देश के लिए अपनी जान गंवाने वाले शहीदों की सिर्फ टोपी ही उनके घर जाती थी लेकिन नेताजी ने शासकीय सम्मान के साथ शहीदों के पार्थिव शरीर को उनके घरों तक भेजने का निर्णय किया जो बेहद भावनात्मक फैसला रहा।
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