मास्टाइटिस (थनैला) की शुरुआती पहचान और बचाव: बरसात के मौसम में पशुपालकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश…..

मास्टाइटिस (थनैला) की शुरुआती पहचान और बचाव: बरसात के मौसम में पशुपालकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश…..

डॉ. आलोक सिंह पालीवाल 
तहलका 24×7 विशेष 
                   दूध देने वाले पशुओं में होने वाली सबसे आम और सबसे अधिक आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाली बीमारियों में मास्टाइटिस (थनैला) प्रमुख है।यह केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि पशुपालक की मेहनत,आय और पशु के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालने वाली समस्या है।यदि समय रहते इसकी पहचान कर ली जाए और सही देखभाल की जाए तो अधिकांश मामलों में बड़े नुकसान से बचा जा सकता है।
पूर्वांचल के जिलों में बरसात का मौसम शुरु होते ही थनैला के मामलों में तेजी से वृद्धि देखने को मिलती है। लगातार नमी,कीचड़,गंदगी,गीला बिछावन और मक्खियों की अधिकता बैक्टीरिया को तेजी से बढ़ने का अवसर देती है।यही कारण है कि जुलाई से सितंबर के बीच पशुपालकों को विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।बरसात के दिनों में अक्सर पशु लंबे समय तक गीली जमीन पर खड़े या बैठे रहते हैं।यदि थनों की सफाई पर ध्यान नहीं दिया जाता,तो सूक्ष्म जीव थन की नली से अंदर प्रवेश कर संक्रमण पैदा कर देते हैं।
शुरुआत में यह संक्रमण हल्का होता है,लेकिन लापरवाही करने पर दूध उत्पादन में भारी कमी,थन खराब होना और कई बार पशु की जान तक जोखिम में पड़ सकती है।मास्टाइटिस की शुरुआती पहचान ही इसका सबसे बड़ा बचाव है।यदि दुहाई के समय दूध में छोटे-छोटे दाने,फटे हुए दूध जैसा रुप,पानी जैसा पतला दूध,हल्का खून या पीले रंग का स्राव दिखाई दे तो इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज न करें।यह बीमारी की शुरुआती चेतावनी हो सकती है।
कई बार पशु का थन सामान्य से अधिक गर्म महसूस होता है।थन में सूजन,दर्द या कठोरता आ जाती है।पशु दुहने के समय पैर मारने लगता है,बेचैन रहता है या थन छूने नहीं देता।ऐसे संकेत बताते हैं कि थन में संक्रमण विकसित हो रहा है।कुछ मामलों में बीमारी बाहर से दिखाई नहीं देती लेकिन दूध उत्पादन अचानक कम होने लगता है।इसे सब-क्लिनिकल मास्टाइटिस कहा जाता है।यही कारण है कि नियमित रुप से दूध की गुणवत्ता पर ध्यान देना बहुत जरुरी है।पूर्वांचल के ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर पशु खुले स्थानों पर बांधे जाते हैं।
बरसात में वहां पानी भर जाता है और कीचड़ जमा हो जाती है।यदि पशु उसी स्थान पर बैठता है तो संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।इसलिए पशु के बैठने की जगह हमेशा सूखी,साफ और ऊंची होनी चाहिए। दूध निकालने से पहले थनों को साफ पानी से धोकर साफ कपड़े से अच्छी तरह सुखाना चाहिए।गीले थनों पर कभी भी दुहाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि नमी बैक्टीरिया के फैलाव को बढ़ाती है।दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ भी पूरी तरह साफ होने चाहिए।गंदे हाथ संक्रमण फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम बन सकते हैं। यदि संभव हो तो दुहाई से पहले और बाद में हाथों को साबुन से धोना चाहिए।
दुहाई हमेशा एक निश्चित समय पर और पूरी तरह करनी चाहिए।थनों में दूध बचा रह जाने पर संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।अधूरी दुहाई कई बार मास्टाइटिस का कारण बनती है।दुहाई के बाद थनों को आयोडीन या क्लोरहेक्सिडीन युक्त टीट डिप में डुबोना सबसे प्रभावी बचाव उपायों में से एक माना जाता है।इससे थन की नली में बैक्टीरिया प्रवेश नहीं कर पाते।बरसात के मौसम में मक्खियों की संख्या बढ़ जाती है।मक्खियां संक्रमण फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।इसलिए पशुशाला में नियमित सफाई,कीट नियंत्रण और गोबर का सही निस्तारण आवश्यक है।
संतुलित आहार भी थनैला से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।यदि पशु को पर्याप्त खनिज मिश्रण, विटामिन और स्वच्छ पानी मिलता है तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर रहती है।घरेलू स्तर पर कुछ उपाय प्रारंभिक देखभाल में सहायक हो सकते हैं,लेकिन इन्हें उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।यदि थन में हल्की सूजन हो तो दिन में कई बार गुनगुने पानी की सिकाई करने से आराम मिल सकता है।इससे रक्त संचार बेहतर होता है और सूजन कम करने में सहायता मिलती है।
थनों की हल्के हाथों से ऊपर से नीचे की ओर मालिश भी दूध के प्रवाह को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।मालिश बहुत धीरे-धीरे करें ताकि थनों को अतिरिक्त चोट न पहुंचे।पशु को हमेशा स्वच्छ और पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराएं।शरीर में पानी की कमी होने पर पशु जल्दी कमजोर होता है और संक्रमण से लड़ने की क्षमता घट सकती है।बरसात में बिछावन के लिए सूखा भूसा, सूखी पराली या सूखी रेत का उपयोग करना लाभदायक रहता है।गीला बिछावन तुरंत बदल देना चाहिए।यदि किसी पशु को मास्टाइटिस हो जाए तो उसका दूध स्वस्थ पशुओं के दूध में कभी न मिलाएं।
बीमार पशु की दुहाई हमेशा सबसे अंत में करें और उसके बाद हाथ तथा बर्तन अच्छी तरह धोएं।कई पशुपालक शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर घरेलू नुस्खों पर कई दिन तक निर्भर रहते हैं।इससे संक्रमण गंभीर हो सकता है।यदि पशु को तेज बुखार हो,थन बहुत ज्यादा सूज जाए,दूध में खून आए या पशु खाना छोड़ दे तो तुरंत योग्य पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।याद रखें कि घरेलू उपाय केवल प्रारंभिक सहायक देखभाल के लिए हैं।बैक्टीरिया से होने वाले मास्टाइटिस में उचित जांच और पशु चिकित्सक द्वारा निर्धारित एंटीबायोटिक एवं अन्य उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है।
पूर्वांचल में बरसात के दौरान यदि पशुपालक केवल तीन बातों का ध्यान रखें जिसमें साफ पशुशाला,साफ थन और साफ दुहाई हो तो थनैला के अधिकांश मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है।स्वस्थ थन ही अधिक और गुणवत्तापूर्ण दूध की पहचान है।थोड़ी-सी सावधानी आपके पशु को दर्द से बचा सकती है और आपकी आय को सुरक्षित रख सकती है।इसलिए बरसात के इस मौसम में अपने पशुओं के थनों की नियमित जांच करें, स्वच्छता बनाए रखें और किसी भी शुरुआती लक्षण को हल्के में न लें।समय पर पहचान और सही उपचार ही मास्टाइटिस के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार है।
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